चेक जारी करने वाले द्वारा पेमेंट रोकने के लिए किए गए बड़े बदलाव पर NI Act की धारा 138 लागू होगी; 'बदलाव किसने किया' यह जांच का विषय: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट
इस बात पर ज़ोर देते हुए कि चेक में किया गया कोई बड़ा बदलाव अपने आप में आरोपी को आपराधिक ज़िम्मेदारी से बरी नहीं करता, जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने कहा कि नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट (NI Act) के तहत निर्णायक कारक सिर्फ़ बदलाव की मौजूदगी नहीं है, बल्कि उस व्यक्ति की पहचान है जिसने वह बदलाव किया।
जस्टिस संजय धर की बेंच ने फैसला सुनाया कि जहां पेमेंट रोकने और धारा 138 के तहत कार्यवाही को नाकाम करने के लिए खुद ड्रॉअर द्वारा बदलाव किया जाता है, वहां मुक़दमे को शुरुआती दौर में ही खत्म नहीं किया जा सकता, क्योंकि ऐसे बदलाव की ज़िम्मेदारी का सवाल एक तथ्य का सवाल है जिसे ट्रायल के दौरान तय किया जाना है।
यह फैसला एक याचिका खारिज करते हुए आया, जिसमें चेक अनादर शिकायत और ट्रायल मजिस्ट्रेट द्वारा पारित संज्ञान आदेश रद्द करने की मांग की गई थी, जो चेक राशि में कथित बदलावों से संबंधित था।
मामले की पृष्ठभूमि
प्रतिवादी-शिकायतकर्ता ने NI Act की धारा 138 और 142 के तहत एक शिकायत दर्ज की, जिसमें आरोप लगाया गया कि याचिकाकर्ता पर उसका ₹14 लाख बकाया था और उसने उक्त देनदारी चुकाने के लिए 11 मई, 2022 की तारीख का एक चेक जारी किया। पेश करने पर चेक बिना भुगतान के वापस कर दिया गया, जिसमें बैंक का एंडोर्समेंट था: "बदलावों के लिए ड्रॉअर के प्रमाणीकरण की आवश्यकता है"।
कानूनी मांग नोटिस जारी होने और ड्रॉअर द्वारा निर्धारित अवधि के भीतर भुगतान करने में विफल रहने के बाद शिकायतकर्ता ने अतिरिक्त मोबाइल मजिस्ट्रेट, शोपियां से संपर्क किया। मजिस्ट्रेट ने प्रथम दृष्टया मामला पाते हुए संज्ञान लिया और आरोपी के खिलाफ प्रक्रिया जारी की। इन कार्यवाहियों को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई।
याचिकाकर्ता के वकील एडवोकेट मुदस्सिर बिन हसन ने तर्क दिया कि चेक शिकायतकर्ता द्वारा जाली बनाया गया। यह तर्क दिया गया कि याचिकाकर्ता पर केवल ₹14,000 बकाया था और शिकायतकर्ता ने चेक पर अंकों और शब्दों को बदलकर धोखाधड़ी से "14,000" को "14.00 लाख" में बदल दिया।
याचिकाकर्ता ने दावा किया कि उसके खाते में पर्याप्त बैलेंस था और अनादर फंड की कमी के कारण नहीं, बल्कि शिकायतकर्ता द्वारा की गई जालसाजी के कारण हुआ।
NI Act की धारा 138 पर कोर्ट की टिप्पणियां
जस्टिस धर ने नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 के दायरे की जाँच की और दोहराया कि चेक का डिसऑनर सिर्फ़ फंड की कमी के मामलों तक ही सीमित नहीं है। M/s लक्ष्मी डाईकेम बनाम गुजरात राज्य के सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भरोसा करते हुए कोर्ट ने कहा कि धारा 138 उन कई स्थितियों को कवर करता है, जहां डिसऑनर ड्रॉअर के जानबूझकर किए गए कामों या चूकों के कारण होता है, जिनका मकसद चेक को पास होने से रोकना होता है।
कोर्ट ने कहा कि ऐसे काम जैसे कि बैंक में मौजूद सैंपल सिग्नेचर से मेल न खाने वाले सिग्नेचर करना, या चेक में बिना ऑथेंटिकेशन के ओवरराइटिंग या बदलाव करना, अगर पेमेंट रोकने के इरादे से किया जाता है, तो उन पर सीधे धारा 138 लागू होगा।
कोर्ट ने कहा,
"जब तक ड्रॉअर का कोई काम या चूक चेक को पास होने से रोकने के इरादे से किया जाता है, तब तक डिसऑनर NI Act की धारा 138 के तहत अपराध बन जाएगा।"
खास तौर पर नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 87 पर आते हुए कोर्ट ने कहा कि चेक में लिखी रकम में कोई भी बदलाव निस्संदेह एक बड़ा बदलाव है। ऐसी स्थिति में सामान्य परिस्थितियों में, नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट उस पार्टी के खिलाफ़ अमान्य हो जाता है, जिसने इस पर सहमति नहीं दी थी, जब तक कि यह मूल पार्टियों के सामान्य इरादे को पूरा करने के लिए न किया गया हो।
हालांकि, जस्टिस धर ने यह साफ़ कर दिया कि कानूनी जांच सिर्फ़ मटेरियल बदलाव की पहचान करने तक सीमित नहीं रह सकती। असली बात यह है कि बदलाव किसने किया और किस मकसद से किया।
अगर बदलाव आरोपी-ड्रॉअर ने किया और इसका मकसद पेमेंट को रोकना या धारा 138 के तहत कार्यवाही को नाकाम करना है तो ड्रॉअर को अपने ही गलत काम का फ़ायदा उठाकर मुक़दमे से बचने की इजाज़त नहीं दी जा सकती।
दूसरी ओर, अगर बदलाव पाने वाले ने गलत फ़ायदा उठाने के लिए किया तो कानूनी नतीजे पूरी तरह से अलग हो सकते हैं।
कोर्ट ने साफ़ तौर पर कहा,
"चेक में किस पार्टी ने बदलाव किया, यह एक तथ्य का सवाल है जिसे सिर्फ़ ट्रायल के दौरान ही तय किया जा सकता है।"
वीरा एक्सपोर्ट्स बनाम टी. कलावती मामले में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले पर भरोसा करते हुए हाईकोर्ट ने दोहराया कि बदलाव की सहमति और ऐसे बदलाव की ज़िम्मेदारी से जुड़े विवादों के लिए सबूत ज़रूरी हैं। कोर्ट ने कहा कि ऐसे तथ्यात्मक विवादों पर शिकायत रद्द करने की कार्यवाही में फ़ैसला नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता ने कानूनी डिमांड नोटिस का जवाब नहीं दिया, जिसमें उसने अपना पक्ष बताया हो। कोर्ट ने तर्क दिया कि अगर याचिकाकर्ता ने डिमांड नोटिस का जवाब दिया होता, तो "हालात अलग हो सकते थे", लेकिन ऐसा न करने से यह बात और पक्की हो गई कि बदलाव किसने किया, यह तय करना ट्रायल का मामला है।
इस तरह यह मानते हुए कि याचिका में मटेरियल बदलाव और पार्टियों के बर्ताव के बारे में तथ्यों के विवादित सवाल उठाए गए, जस्टिस संजय धर ने शिकायत या समन आदेश में दखल देने से इनकार कर दिया। याचिका खारिज कर दी गई और याचिकाकर्ता को ट्रायल कोर्ट के सामने सभी ज़रूरी बचाव पेश करने की छूट दी गई।
Case Title: Abdul Hamid Wani Vs Abdul Hamid Lone