पुलिस के पास हैंडराइटिंग, सिग्नेचर लेने की पावर CrPC की धारा 311-A से अलग: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने CBI जांच के खिलाफ रिवीजन खारिज की
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पेशल जज के उस आदेश को चुनौती देने वाली क्रिमिनल रिवीजन पिटीशन खारिज की, जिसमें कहा गया कि हैंडराइटिंग और सिग्नेचर लेने की पावर इन्वेस्टिगेशन पावर है और यह सिर्फ CrPC की धारा 311-A पर निर्भर नहीं है।
कोर्ट ने साफ किया कि CrPC की धारा 311-A को सैंपल सिग्नेचर और हैंडराइटिंग लेने की पावर का अकेला सोर्स मानने से पुलिस की इन्वेस्टिगेशन अथॉरिटी बेवजह कम हो जाएगी।
जस्टिस राकेश कैंथला ने कहा:
“यह कहना कि CrPC की धारा 311A ही इन्वेस्टिगेशन के दौरान आरोपी से सिग्नेचर और हैंडराइटिंग लेने की पावर का एकमात्र सोर्स है, पुलिस के पास हमेशा से मौजूद एक पावर को खत्म करने जैसा होगा। इसलिए इस बात से सहमत होना मुश्किल है कि CBI के पास सैंपल सिग्नेचर लेने का कोई अधिकार नहीं था।”
यह केस तब सामने आया, जब CBI ने एक चार्जशीट फाइल की। इसमें आरोप लगाया गया कि याचिकाकर्ता मिसेज पाली दीवान मेसर्स रिसोर्स फूड्स की पार्टनर हैं। उन्होंने इंटीग्रेटेड फूड चेन प्रोजेक्ट शुरू करने के लिए नॉन-रिकरिंग ग्रांट-इन-एड पाने के लिए आवेदन दिया।
चार्जशीट के मुताबिक, याचिकाकर्ता जाली इनवॉइस और नकली डॉक्यूमेंट्स का इस्तेमाल करके ग्रांट पाने की साज़िश का हिस्सा थी।
याचिकाकर्ता ने ट्रायल कोर्ट में डिस्चार्ज एप्लीकेशन फाइल की, जिसमें कहा गया कि उनके खिलाफ कार्रवाई करने के लिए काफी मटीरियल नहीं है और हैंडराइटिंग एक्सपर्ट की रिपोर्ट भी फोटोकॉपी पर आधारित थी, जो गलत सबूत है।
हालांकि, ट्रायल कोर्ट ने इस आधार पर एप्लीकेशन खारिज की कि याचिकाकर्ता के खिलाफ आरोप तय करने के लिए पहली नज़र में काफी मटीरियल था और डिस्चार्ज के स्टेज पर उसके बचाव की डिटेल में जांच नहीं की जा सकती थी।
इससे दुखी होकर याचिकाकर्ता ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और कहा कि अपराध करने से उसका कोई लेना-देना नहीं है।
उसने कहा कि उसने कोई जाली डॉक्यूमेंट्स जमा नहीं किए और चार्जशीट में यह नहीं बताया गया कि याचिकाकर्ता ने मिनिस्ट्री को कोई डॉक्यूमेंट साइन, एग्जीक्यूट या पेश नहीं किया।
रिकॉर्ड देखने के बाद कोर्ट ने देखा कि मिनिस्ट्री को सबमिट करने से पहले कोटेशन और इनवॉइस में बदलाव किए गए, जिससे पता चलता है कि याचिकाकर्ता ने नकली डॉक्यूमेंट्स लगाकर एक प्रपोज़ल सबमिट किया।
इसके अलावा कोर्ट ने साफ़ किया कि याचिकाकर्ता पर सिर्फ़ पार्टनर होने की वजह से केस नहीं चलाया जा रहा था, बल्कि प्रपोज़ल के साथ नकली डॉक्यूमेंट्स सबमिट करने के खास आरोपों की वजह से केस चलाया जा रहा था।
इस तरह कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के नतीजों को सही ठहराया और याचिका खारिज की।
Case Name:Pali Diwan v/s Central Bureau of Investigations