ट्रैक के पास बिजली का खंभा: हिमचाल प्रदेश हाईकोर्ट ने रेलवे एक्ट के तहत शिमला के पार्षद के खिलाफ FIR रद्द की
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने रेलवे एक्ट, 1989 की धारा 153 (जानबूझकर या गलती से रेलवे से यात्रा करने वाले लोगों की सुरक्षा को खतरे में डालना) के तहत दर्ज FIR रद्द की।
कोर्ट ने माना कि रिकॉर्ड में याचिकाकर्ता के किसी भी गैर-कानूनी या जानबूझकर किए गए काम का खुलासा नहीं हुआ, जिसके बारे में कहा जा सके कि उसने रेलवे यात्रियों की सुरक्षा को खतरे में डाला हो।
कोर्ट ने आगे कहा कि याचिकाकर्ता की कोई सीधी भागीदारी नहीं थी। साथ ही कोई भी रिकॉर्ड यह नहीं दिखाता कि सक्षम अधिकारी से मंजूरी मिलने के बाद वह काम करने में शामिल था।
रेलवे एक्ट की धारा 153 की जांच करते हुए कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई अपराध नहीं बनता, क्योंकि वह किसी भी समय किसी भी गैर-कानूनी गतिविधि में शामिल नहीं था।
जस्टिस संदीप शर्मा ने कहा:
“रिकॉर्ड में ऐसा कुछ भी नहीं है, जिससे पता चले कि रेलवे लाइन के किनारे बिजली का खंभा लगाने से रेलवे में या किसी रेलवे लाइन पर यात्रा करने वाले किसी भी व्यक्ति की सुरक्षा खतरे में पड़ी हो।”
कोर्ट ने आगे कहा:
“बयानों और रिकॉर्ड से यह साफ पता चलता है कि रेलवे अधिकारियों से मंजूरी मिलने के बाद याचिकाकर्ता का कोई रोल नहीं था, जबकि इसके बाद काम करने वाली एजेंसी के अधिकारियों ने मौके पर ही काम किया।”
पृष्ठभूमि:
याचिकाकर्ता म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन, शिमला के पार्षद ने जनहित में सीवरेज पाइपलाइन बिछाने का मुद्दा उठाया। रेलवे अधिकारियों ने रेलवे ट्रैक के किनारे पाइपलाइन बिछाने की मंजूरी दी।
हालांकि, बाद में रेलवे अधिकारियों ने आरोप लगाया कि काम करने वाली एजेंसी ने मंजूर प्लान और ट्रैक का पालन नहीं किया। रेलवे अधिकारियों ने काम करने वाली एजेंसी यानी म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन, शिमला को बार-बार नोटिस भेजे।
इसके बावजूद, संबंधित वार्ड के पार्षद ने रेलवे लाइन के किनारे बिजली का खंभा लगाने पर जोर दिया, जिससे रेलवे में यात्रा करने वाले लोगों की सुरक्षा खतरे में पड़ गई।
इसलिए याचिकाकर्ता और दो अन्य अधिकारियों के खिलाफ रेलवे एक्ट की धारा 153 के तहत क्रिमिनल केस दर्ज किया गया।
Case Name: Diwakar Dev Sharma v/s Railway Police Force and Anr.