नाबालिग की अभिरक्षा को लेकर माता-पिता के बीच विवाद में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका ग्राह्य नहीं: हिमाचल प्रदेश हाइकोर्ट

Update: 2026-02-26 10:59 GMT

हिमाचल प्रदेश हाइकोर्ट ने एक पिता द्वारा अपनी नाबालिग पुत्री की पेशी और अभिरक्षा की मांग को लेकर दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई से इनकार करते हुए स्पष्ट किया कि माता-पिता के बीच अभिरक्षा विवाद की स्थिति में उचित उपाय सक्षम अभिभावक न्यायालय के समक्ष ही उपलब्ध है।

चीफ जस्टिस जी. एस. संधावालिया और जस्टिस बिपिन सी. नेगी की खंडपीठ ने कहा कि जब नाबालिग का ठिकाना स्पष्ट रूप से ज्ञात हो, तो उस स्थान पर अधिकार क्षेत्र रखने वाले न्यायालय से ही राहत मांगी जानी चाहिए।

याचिकाकर्ता -पिता ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर कर आरोप लगाया कि प्रतिवादी नंबर तीन, जो बच्ची की माता है, उसे अपने साथ ले गई। उसने नाबालिग पुत्री की तत्काल अभिरक्षा उसे सौंपने की मांग करते हुए कहा कि बच्ची के हित में ऐसा करना आवश्यक है और अन्यथा उसे मानसिक, भावनात्मक तथा शैक्षणिक क्षति हो सकती है।

याचिकाकर्ता ने यह भी प्रार्थना की थी कि बच्ची की पूर्व विद्यालय में पढ़ाई निर्बाध रूप से जारी रखने के निर्देश दिए जाएं ताकि उसका शैक्षणिक सत्र प्रभावित न हो।

अभिलेखों के अनुसार दोनों पक्षों का विवाह 25 फरवरी, 2012 को संपन्न हुआ। 13 सितंबर, 2021 को पंजीकृत हुआ। नाबालिग का जन्म 6 जुलाई, 2017 को धर्मशाला के निकट कांगड़ा जिले में हुआ। दंपति चंडीगढ़, मुंबई, बेंगलुरु और बाद में थाईलैंड की राजधानी बैंकॉक में रहे, जहां याची वर्तमान में निवास कर रहा है।

याचिका में कहा गया कि माता 10 अक्टूबर 2025 को नाबालिग के साथ भारत आई। दीपावली के बाद बैंकॉक लौटने पर वह 25 से 26 नवंबर, 2025 तक अस्पताल में भर्ती रही, इसी दौरान उसका भाई भी बैंकॉक पहुंचा। याचिकाकर्ता के अनुसार 13 दिसंबर, 2025 को वह बैंकॉक छोड़कर चली गई। 15 दिसंबर को जब वह घर लौटा तो पाया कि बच्ची का सामान भी हटा लिया गया। 29 दिसंबर 2025 को पारिवारिक सदस्यों के साथ की गई वार्ता सहित कई प्रयासों के बावजूद कोई सहयोग नहीं मिला। बाद में उसे बताया गया कि वह धर्मशाला पहुंच गई।

मामला अवकाशकालीन जस्टिस के समक्ष सूचीबद्ध हुआ, जिन्होंने याचिकाकर्ता को यह स्पष्ट करने को कहा कि उसकी याचिका सुनवाई योग्य कैसे है।

खंडपीठ ने अपने पूर्व निर्णय सौरव रतन बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य एवं अन्य (निर्णय दिनांक 9 मई 2025) का उल्लेख करते हुए कहा कि माता-पिता के बीच अभिरक्षा विवाद में साक्ष्यों के आधार पर निर्णय करने का अधिकार अभिभावक न्यायालय को है।

अदालत ने दोहराया कि बंदी प्रत्यक्षीकरण एक असाधारण उपाय है और जब प्रभावी वैकल्पिक उपाय उपलब्ध हो तब सामान्यतः इसका उपयोग नहीं किया जाता।

अदालत ने महत्वपूर्ण रूप से यह भी कहा कि स्वयं याची ने याचिका में उल्लेख किया कि माता और नाबालिग धर्मशाला में रह रहे हैं। ऐसी स्थिति में यह नहीं कहा जा सकता कि बच्ची का ठिकाना अज्ञात है।

खंडपीठ ने कहा कि जब बंदी का स्थान ज्ञात हो तो जिस क्षेत्र में वह रह रही है, वहां का न्यायालय ही इस प्रकार की याचिका पर अधिकार रखता है। यदि याचिकाकर्ता सक्षम न्यायालय के समक्ष याचिका दायर करता है तो वह न्यायालय मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए शीघ्र सुनवाई सुनिश्चित करेगा।

अदालत ने कहा,

“बच्ची को विदेश से स्थानांतरित किया गया, पिता विदेश में है और वर्तमान याचिका का शपथपत्र भी पुणे में सत्यापित किया गया। ऐसी स्थिति में यदि सक्षम अधिकार क्षेत्र वाले न्यायालय के समक्ष याचिका दायर की जाती है तो न्यायालय इस विषय की संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए शीघ्र विचार करेगा।”

इन टिप्पणियों के साथ हाइकोर्ट ने याचिका खारिज की।

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