“नहीं” का मतलब “नहीं”: एचपी हाईकोर्ट ने अग्रिम जमानत देने से इनकार किया, कहा- रिश्ते में होने का मतलब यह नहीं कि यौन-कृत्य की सहमति मिल गई
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि किसी रिश्ते में होने का मतलब यह नहीं है कि कोई व्यक्ति अपने साथी की मर्जी के खिलाफ यौन क्रियाएं कर सकता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि “नहीं” का मतलब “नहीं” ही होता है।
कोर्ट ने यह टिप्पणी तब की जब उसने अपनी मंगेतर के यौन उत्पीड़न के आरोपी व्यक्ति की अग्रिम जमानत याचिका खारिज की। इस मामले में शुरुआती जांच और मेडिकल सबूतों से भी आरोपों की पुष्टि होती दिख रही है।
जस्टिस चिराग भानु सिंह ने कहा:
इस मामले के तथ्यों को देखते हुए, इतना कहना ही काफी है कि याचिकाकर्ता/आरोपी का बर्ताव पूरी तरह से अमानवीय था। भले ही वे रिश्ते में थे, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उसे पीड़िता के साथ यौन उत्पीड़न करने या इतना बर्बर व्यवहार करने की छूट मिल गई। “नहीं” का मतलब “नहीं” ही होता है।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता ने भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धाराओं 64(1), 115(2) और 351(2) के तहत दर्ज FIR में अग्रिम जमानत के लिए हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
शिकायतकर्ता लगभग दस वर्षों से याचिकाकर्ता के साथ रिश्ते में थी और उससे उसकी सगाई भी हो चुकी थी, उसने आरोप लगाया कि 23 अगस्त, 2026 को आरोपी ने उसके साथ मारपीट की, यौन उत्पीड़न किया, लाइटर से उसके निजी अंगों को जला दिया और उसका गला दबाने की कोशिश की।
याचिकाकर्ता ने खुद को झूठा फंसाए जाने का दावा किया और शिकायत दर्ज कराने में हुई देरी का हवाला देते हुए आरोपों को गलत बताया। वहीं, शिकायतकर्ता ने मेडिकल सबूतों का हवाला देते हुए अपने आरोपों को सही ठहराया और कहा कि याचिकाकर्ता ने उसे और अन्य गवाहों को डराने-धमकाने की कोशिश की।
हिमाचल प्रदेशहाई कोर्ट ने माना कि मेडिकल-लीगल रिपोर्ट से शिकायतकर्ता के आरोपों की शुरुआती पुष्टि होती है, जिसमें चोटों और जलने के निशानों का जिक्र है।
कोर्ट ने कहा कि शिकायत दर्ज कराने में हुई देरी, अग्रिम जमानत के चरण में कोई निर्णायक कारक नहीं है। साथ ही किसी रिश्ते में होने का मतलब यह नहीं है कि व्यक्ति की मर्जी के खिलाफ यौन क्रियाओं के लिए सहमति मिल गई। आरोपों की गंभीरता और याचिकाकर्ता के कथित आचरण—जिसमें शिकायतकर्ता और गवाहों को डराने-धमकाने की कोशिशें भी शामिल हैं—को देखते हुए अदालत ने अग्रिम जमानत याचिका खारिज की।
अदालत ने संशोधित MLC प्रारूप में चोटों की संभावित अवधि दर्ज करने वाले कॉलम के न होने की ओर भी ध्यान दिलाया और राज्य को इस संबंध में सुधारात्मक कदम उठाने का निर्देश दिया।
Case Title : Tarun Bharota v/s State of HP & Anr