हिमाचल प्रदेश हाइकोर्ट ने स्पष्ट किया कि शिक्षा का अधिकार कानून बच्चों को छह से चौदह वर्ष की आयु तक निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा की गारंटी देता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि 14 वर्ष से अधिक आयु का व्यक्ति स्कूल में पढ़ाई जारी नहीं रख सकता। अदालत ने इसी आधार पर एक याचिका खारिज की, जिसमें एक पार्ट टाइम मल्टी टास्क वर्कर की नियुक्ति को चुनौती दी गई।
जस्टिस अजय मोहन गोयल ने अपने आदेश में कहा कि शिक्षा का अधिकार कानून, 2009 का उद्देश्य छह से चौदह वर्ष तक के बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा उपलब्ध कराना है।
अदालत ने कहा,
“इस कानून के प्रावधानों को ध्यान से देखने पर यह स्पष्ट होता है कि इसमें कहीं भी ऐसा कोई वैधानिक प्रतिबंध नहीं है कि चौदह वर्ष से अधिक आयु का व्यक्ति स्कूल में आठवीं कक्षा में प्रवेश नहीं ले सकता।”
मामले की पृष्ठभूमि
सिरमौर जिले के एक सरकारी प्राथमिक विद्यालय में पार्ट टाइम मल्टी टास्क वर्कर की नियुक्ति को लेकर विवाद था। याचिकाकर्ता पंकज चौहान ने नियुक्ति को चुनौती देते हुए आरोप लगाया कि चयनित उम्मीदवार पहले आठवीं कक्षा में असफल हो गया। बाद में 14 वर्ष की आयु पार करने के बाद निजी स्कूल से आठवीं का प्रमाणपत्र प्राप्त किया, जो शिक्षा का अधिकार कानून के प्रावधानों के खिलाफ है।
हालांकि, अदालत ने पाया कि संबंधित प्रमाणपत्र की जांच संबंधित अधिकारियों द्वारा की जा चुकी है और उसकी प्रामाणिकता पर संदेह करने का कोई आधार नहीं है।
याचिकाकर्ता ने पहले पार्ट टाइम मल्टी टास्क वर्कर योजना 2020 के तहत अपील दायर की, जिसे प्रथम अपीलीय प्राधिकारी ने यह कहते हुए खारिज किया कि अपील में कोई ठोस आधार नहीं है। इसके बाद याचिकाकर्ता ने स्कूल शिक्षा निदेशक के समक्ष अपील की जिसे भी अस्वीकार किया गया।
इन आदेशों से असंतुष्ट होकर याचिकाकर्ता ने हाइकोर्ट का दरवाजा खटखटाया लेकिन अदालत ने सभी दलीलों को खारिज करते हुए याचिका को निरस्त किया।