पंचायत चुनावों में गलत जानकारी देने पर छह साल की अयोग्यता ज़्यादा नहीं: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट

Update: 2026-04-27 04:34 GMT

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि पंचायत पदाधिकारियों को नामांकन पत्रों में गलत जानकारी देने के कारण छह साल के लिए अयोग्य ठहराना मनमाना या ज़्यादा नहीं है।

कोर्ट ने टिप्पणी की कि ऐसा कदम यह सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया कि ऐसी अयोग्यता प्रभावी और सार्थक बनी रहे, खासकर पंचायती राज संस्थाओं के पांच साल के चुनावी चक्र को देखते हुए।

जस्टिस विवेक सिंह ठाकुर और जस्टिस रंजन शर्मा की डिवीज़न बेंच ने टिप्पणी की:

"6 साल की अयोग्यता एक मकसद के साथ तय की गई, क्योंकि 5 साल से कम अवधि के लिए दी गई कोई भी सज़ा चुनाव लड़ने की अयोग्यता को बेमानी बना सकती है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि पंचायती राज संस्थाओं में 5 साल का कार्यकाल पूरा होने के बाद चुनाव होते हैं> अगर किसी व्यक्ति को 5 साल से कम अवधि के लिए अयोग्य ठहराया जाता है तो वह व्यक्ति... अगले पंचायत चुनाव लड़ने में सक्षम होगा..."

मामले की पृष्ठभूमि:

याचिकाकर्ता 2020 में ग्राम पंचायत पांगना के प्रधान चुने गए, अपने नामांकन पत्र में एक लंबित आपराधिक मामले का खुलासा करने में विफल रहे। इस चूक के कारण उप-विभागीय अधिकारी (सिविल) ने उनके चुनाव को अमान्य घोषित किया। इस फैसले को अपील रिट कार्यवाही और यहां तक कि डिवीज़न बेंच ने भी सही ठहराया।

इसके बाद डिप्टी कमिश्नर ने हिमाचल प्रदेश पंचायती राज अधिनियम, 1994 की धारा 146 का इस्तेमाल करते हुए याचिकाकर्ता को छह साल के लिए चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित कर दिया, जिसके चलते यह मौजूदा चुनौती सामने आई।

याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि आपराधिक मामले के लंबित होने का खुलासा न करने के लिए 6 साल तक चुनाव लड़ने से अयोग्य ठहराना—जबकि याचिकाकर्ता बाद में उस मामले में बरी भी हो गया—न केवल कठोर और असंगत है, बल्कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के भी विरुद्ध है।

उन्होंने आगे तर्क दिया कि धारा 146(2) संबंधित सक्षम प्राधिकारी को अयोग्यता के कारण की प्रकृति के आधार पर आनुपातिक सज़ा देने का कोई विवेक नहीं देती है। यह धारा पंचायत पदाधिकारी के पद के लिए चुनाव लड़ने और पद पर बने रहने की अयोग्यता से संबंधित है। याचिकाकर्ता के अनुसार, यह धारा मनमानी है, क्योंकि यह उचित मामलों में कम सज़ा देने की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ती है। इसलिए इस प्रावधान को भी रद्द किया जाना चाहिए।

कोर्ट ने टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता ने जानबूझकर एक झूठा हलफनामा/वचनपत्र दाखिल किया, जिसमें उसने अपने खिलाफ लंबित आपराधिक मामले के तथ्य को छिपाया था। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि अयोग्यता का आधार अपराध की प्रकृति या उसकी गंभीरता नहीं, बल्कि स्वयं झूठी घोषणा करने का कृत्य है।

अदालत ने कहा कि किसी उम्मीदवार से यह अपेक्षा की जाती है कि वह ईमानदारी से काम करे, सभी विवरणों को सावधानी और ज़िम्मेदारी के साथ प्रकट करे और नामांकन पत्र में की जाने वाली घोषणा की पवित्रता का भी उचित सम्मान करे।

अतः, अदालत ने यह निर्णय दिया कि चुनावी प्रक्रिया में भ्रष्ट आचरण के लिए सज़ा अधिक कठोर होनी चाहिए और अधिनियम की धारा 146(2) के तहत दी गई अयोग्यता न तो कठोर है और न ही असंगत।

Case Name: Basant Lal V/s State of H.P. & others

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