एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट मालिकाना हक के विवाद का फैसला किए बिना गांव के रास्ते से रुकावट हटाने का आदेश दे सकते हैं: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट

Update: 2026-06-05 14:23 GMT

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने कल्पा के सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट (SDM) के उस आदेश को सही ठहराया, जिसमें गांव वालों द्वारा दशकों से इस्तेमाल किए जा रहे रास्ते से रुकावट हटाने का निर्देश दिया गया था। कोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट ने केवल क्रिमिनल प्रोसीजर कोड (CrPC) की धारा 147 के तहत इस्तेमाल के मौजूदा अधिकार की रक्षा की थी, न कि मालिकाना हक के किसी सवाल पर फैसला सुनाया था।

कोर्ट ने कहा कि हालांकि मालिकाना हक के विवादों का फैसला केवल सिविल कोर्ट ही कर सकता है, लेकिन एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट को रुकावटें हटाने का आदेश देने का अधिकार है, जहां लंबे समय से रास्ता इस्तेमाल करने का अधिकार स्थापित हो और विवाद से शांति भंग होने की आशंका हो।

जस्टिस संदीप शर्मा ने कहा:

"...सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट ने सांगला के तहसीलदार की रिपोर्ट पर गौर करने के बाद याचिकाकर्ताओं को विवादित रास्ते पर उनके द्वारा बनाई गई रुकावट को हटाने का निर्देश दिया, लेकिन उन्होंने कहीं भी मालिकाना हक के सवाल पर फैसला नहीं किया, जिसे जाहिर तौर पर सिविल कोर्ट ही तय कर सकता है, न कि सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट।"

इसके अलावा कोर्ट ने कहा:

"सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट द्वारा पारित आदेश तब तक लागू रहेंगे, जब तक कि किसी हाईकोर्ट द्वारा उनमें कोई बदलाव न किया जाए या सक्षम न्यायालय यह घोषणा न कर दे कि खसरा नंबर 720 में शामिल जमीन पर पूरी तरह से याचिकाकर्ताओं का मालिकाना हक और कब्ज़ा है। प्रतिवादियों तथा अन्य ग्रामीणों को इसका इस्तेमाल करने का कोई अधिकार नहीं है।"

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद किन्नौर जिले के बस्तेरी गांव में खसरा नंबर 720 में स्थित रास्ते से जुड़ा था। प्रतिवादी हीरा चंद ने शिकायत की थी कि याचिकाकर्ताओं ने गांव के एक पारंपरिक रास्ते को बंद कर दिया, जिसका इस्तेमाल स्थानीय निवासी, उनके पूर्वज और यहां तक ​​कि स्थानीय देवता की शोभायात्रा भी घरों, खेतों और गांव के श्मशान घाट तक जाने के लिए करती थी। जांच के बाद पुलिस ने निष्कर्ष निकाला कि लगातार रुकावट से शांति भंग हो सकती है और SDM, कल्पा के समक्ष CrPC की धारा 147 के तहत एक कलंद्रा (रिपोर्ट) पेश की।

SDM ने सांगला के तहसीलदार से रिपोर्ट मांगी, जिन्होंने पुष्टि की कि खसरा नंबर 720 में रास्ता मौजूद था और याचिकाकर्ताओं ने उसमें रुकावट पैदा की थी। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि स्थानीय रीति-रिवाजों के अनुसार, कोई भी व्यक्ति किसी दूसरे के खेतों तक जाने वाले रास्ते को रोक नहीं सकता। दोनों पक्षों के बयान दर्ज करने के बाद SDM ने याचिकाकर्ताओं को रुकावट हटाने का निर्देश दिया; ऐसा न करने पर अधिकारियों को खुद ऐसा करने का अधिकार दिया गया।

कोर्ट ने गौर किया कि भले ही खसरा नंबर 720 निजी ज़मीन थी, लेकिन शिकायतकर्ता ने लगातार यह कहा था कि स्थानीय देवता और ग्रामीण बहुत पुराने समय से पंचायत के श्मशान घाट तक जाने के लिए उसी रास्ते का इस्तेमाल करते आ रहे हैं। कोर्ट ने पाया कि उप-प्रधान, पटवारी, अन्य ग्रामीणों के बयानों और तहसीलदार की रिपोर्ट से इस दावे की पुष्टि होती है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि स्थानीय रीति-रिवाजों के अनुसार - जिन्हें कानून का दर्जा प्राप्त है - कोई भी व्यक्ति दूसरों के खेतों तक जाने वाले रास्ते को रोक नहीं सकता।

कोर्ट ने फिर से कहा कि CrPC की धारा 147 एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट को दखल देने का अधिकार देती है, जब ज़मीन के इस्तेमाल के अधिकार को लेकर विवाद से शांति भंग होने की आशंका हो। इस अधिकार में उनके सामने पेश किए गए तथ्यों पर विचार करने के बाद रुकावटों को हटाने का निर्देश देना भी शामिल है।

इस प्रकार, कोर्ट को विवादित आदेश में कोई गैर-कानूनी बात या अधिकार क्षेत्र से जुड़ी कोई गलती नहीं मिली और उसने रिविज़न याचिका खारिज की।

Case Name: Pramod Kumar and Another V/s Hir Chand

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