SC/ST Act के तहत आरोप तय करने वाले अंतरिम आदेश के खिलाफ अपील स्वीकार्य नहीं: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 (SC/ST Act) के तहत आरोप तय करने वाले आदेश के खिलाफ अपील स्वीकार्य नहीं है, क्योंकि यह आदेश एक अंतरिम आदेश है और पक्षों के अंतिम अधिकारों का निर्धारण नहीं करता।
जस्टिस जिया लाल भारद्वाज ने टिप्पणी की:
"...आरोप तय करने का आदेश पूरी तरह से एक अंतरिम आदेश है, क्योंकि यह कार्यवाही को समाप्त नहीं करता, बल्कि मुकदमा तब तक चलता रहता है जब तक कि उसका परिणाम बरी होने या दोषी ठहराए जाने के रूप में सामने नहीं आ जाता।"
इसके अलावा, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि SC & ST Act की धारा 14A केवल उन फैसलों या आदेशों के खिलाफ अपील की अनुमति देती है जो प्रकृति में अंतरिम नहीं हैं।
हालांकि, कोर्ट ने टिप्पणी की कि अपीलकर्ता BNSS या अन्य कानूनों के तहत, जैसा कि अनुमति हो, इस कोर्ट के पुनरीक्षण क्षेत्राधिकार या अंतर्निहित क्षेत्राधिकार के उपाय का लाभ उठा सकता है।
मामले की पृष्ठभूमि:
अपीलकर्ता लग्नेश वर्मा ने हाईकोर्ट के समक्ष एक अपील दायर की, जिसमें किन्नौर के सत्र प्रभाग द्वारा पारित उस आदेश को चुनौती दी गई, जिसके तहत उन पर भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 115(2) और 352, तथा SC/ST Act की धारा 3(2)(Va) के तहत आरोप तय किए गए।
उन्होंने तर्क दिया कि आरोप तय करने को अंतरिम आदेश नहीं कहा जा सकता है। इसलिए आरोप तय करने के खिलाफ अपील SC/ST Act की धारा 14A के तहत स्वीकार्य है।
इसके जवाब में राज्य ने तर्क दिया कि आरोप तय करना न तो कार्यवाही को समाप्त करता है और न ही पक्षों के अधिकारों का अंतिम रूप से निर्णय करता है। इस प्रकार इसे अपील योग्य आदेश के रूप में नहीं माना जा सकता है।
Case Name: Lagnesh Verma v/s State of H.P. & others