'समन मिलने के बाद सुनवाई की तारीख के बारे में न बताने के लिए आरोपी अपने पिता को दोषी नहीं ठहरा सकता': हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने देरी माफ करने की अर्जी खारिज की

Update: 2026-03-17 14:07 GMT

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने 130 दिन की देरी माफ करने की अर्जी खारिज की। कोर्ट ने कहा कि अर्जी देने वाला इस दलील पर भरोसा नहीं कर सकता कि कोर्ट का समन मिलने के बाद उसके पिता ने उसे सुनवाई की तारीख के बारे में नहीं बताया।

जस्टिस राकेश कैंथला ने टिप्पणी की:

"जब कानून यह कहता है कि समन परिवार के किसी वयस्क पुरुष सदस्य को दिया जाए तो यह ठीक वैसा ही है जैसे समन सीधे अर्जी देने वाले को दिया गया हो। इसलिए यह दलील कि अर्जी देने वाले को उसके पिता ने सुनवाई की तारीख के बारे में नहीं बताया, उसके काम नहीं आएगी।"

अर्जी देने वाले ने रिवीजन याचिका दायर की, जिसमें एक आदेश के खिलाफ देरी माफ करने की मांग की गई। उस आदेश के तहत केस को आगे न बढ़ाने (Non-Prosecution) के कारण उसकी शिकायत खारिज कर दी गई।

उसने यह दलील दी कि वह कोर्ट में इसलिए पेश नहीं हुआ, क्योंकि उसे सुनवाई की तारीख के बारे में पता नहीं था; उसके पिता को समन मिला था, लेकिन उन्होंने उसे इसके बारे में जानकारी नहीं दी।

उसने आगे यह भी कहा कि उसे मार्च 2025 में शिकायत खारिज होने के बारे में तब पता चला, जब उसने अपने वकील से संपर्क किया। इसके बाद उसने आदेश की एक कॉपी हासिल की और देरी माफ करने की अर्जी के साथ रिवीजन याचिका दायर की।

कोर्ट ने इस बात पर गौर किया कि समन अर्जी देने वाले के पिता को दिया गया, जो उसी के साथ रहते थे। दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 64 का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि "जब समन पाने वाला व्यक्ति नहीं मिल पाता तो आरोपी के साथ रहने वाले परिवार के किसी वयस्क पुरुष सदस्य को समन देना कानूनी रूप से वैध माना जाता है।"

कोर्ट ने यह टिप्पणी भी की कि अर्जी देने वाला इस बात का कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दे पाया कि शिकायत खारिज होने के बाद उसने लगभग तीन महीने तक अपने केस की स्थिति के बारे में कोई पूछताछ क्यों नहीं की।

इस प्रकार, कोर्ट ने देरी माफ करने की अर्जी खारिज की।

Case Name: Kishori Lal v/s Surender Kumar

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