सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जल भुइयां ने सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम में महिलाओं के पर्याप्त प्रतिनिधित्व का मुद्दा उठाते हुए कहा कि मौजूदा कॉलेजियम पुरुषों के वर्चस्व वाला है। उन्होंने सुझाव दिया कि कॉलेजियम की कार्यवाही में किसी महिला जज को आमंत्रित सदस्य के रूप में शामिल किया जाना चाहिए, ताकि न्यायिक नियुक्तियों से जुड़े फैसलों में महिलाओं का नजरिया और अनुभव भी शामिल हो सके।

जस्टिस भुइयां मेघालय की University of Science & Technology के 12वें दीक्षांत समारोह को संबोधित कर रहे थे। इस दौरान उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में महिला जजों की कम संख्या पर चिंता जताई।

उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में 35 जजों की कुल संख्या में केवल तीन महिला जज हैं। यह संख्या देश में महिला वकीलों और महिला जजों के वास्तविक अनुपात को नहीं दर्शाती। उन्होंने कहा कि इस पहलू पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।

Collegium में महिला जज को आमंत्रित सदस्य बनाने का सुझाव

जस्टिस भुइयां ने बताया कि पिछले साल मार्च में वह सुप्रीम कोर्ट परिसर में महिला वकीलों द्वारा आयोजित एक सेमिनार में शामिल हुए थे। इस कार्यक्रम में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में महिलाओं को सीनियर एडवोकेट के रूप में नामित करने और जजों के रूप में नियुक्त करने में पर्याप्त प्रतिनिधित्व देने पर चर्चा हुई थी।

उन्होंने कहा कि उस सेमिनार में उन्होंने सुझाव दिया था कि पुरुषों के वर्चस्व वाले कॉलेजियम में किसी महिला जज को आमंत्रित सदस्य के रूप में शामिल किया जाना चाहिए। उनके अनुसार, इससे बार में महिलाओं की वास्तविक स्थिति और उनके अनुभवों को बेहतर तरीके से समझने में मदद मिलेगी। उन्होंने यह भी कहा कि महिलाओं को कानूनी पेशे में उत्कृष्ट प्रदर्शन करते देखना गर्व की बात है।

महिलाएं न्यायिक सेवाओं में आगे, लेकिन उच्च पदों पर प्रतिनिधित्व घटता है

जस्टिस भुइयां ने न्यायपालिका में महिलाओं के प्रतिनिधित्व को लेकर एक और महत्वपूर्ण अंतर की ओर ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि बड़ी संख्या में महिलाएं कानूनी पेशे में प्रवेश कर रही हैं और अच्छा प्रदर्शन कर रही हैं, लेकिन यह भागीदारी उन्हें पर्याप्त संख्या में सीनियर एडवोकेट के रूप में नामित किए जाने में दिखाई नहीं देती।

उन्होंने इसके लिए चयन प्रक्रिया में इस्तेमाल होने वाले व्यक्तिपरक यानी Subjective मानदंडों को जिम्मेदार ठहराया। जस्टिस भुइयां ने कहा कि उनके शोध के अनुसार, जब चयन वस्तुनिष्ठ यानी Objective Criteria के आधार पर होता है, तब न्यायिक सेवाओं में महिलाओं की भागीदारी काफी अधिक दिखाई देती है।

असम में न्यायिक सेवाओं में महिलाओं की भागीदारी 65 प्रतिशत

उदाहरण देते हुए जस्टिस भुइयां ने असम, मेघालय, राजस्थान, महाराष्ट्र और तेलंगाना की न्यायिक सेवाओं का जिक्र किया।

उन्होंने बताया कि इन राज्यों में Grade III न्यायिक सेवाओं में महिलाओं की भागीदारी 50 प्रतिशत से अधिक है। असम में यह आंकड़ा लगभग 65 प्रतिशत है। वहीं, Grade II यानी मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट स्तर पर महिलाओं की भागीदारी लगभग 45 प्रतिशत है। हालांकि, उन्होंने कहा कि जैसे-जैसे न्यायिक सेवा में उच्च पदों की बात आती है, महिलाओं का प्रतिनिधित्व कम होता जाता है।

Grade I स्तर पर महिलाओं की भागीदारी लगभग 25 से 30 प्रतिशत तक रह जाती है। हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति के स्तर पर यह संख्या और कम दिखाई देती है।

Collegium आधारित नियुक्तियों में महिलाओं की संख्या घटने पर सवाल

जस्टिस भुइयां ने कहा कि जब चयन प्क्रिया व्यक्तिपरक हो जाती है, जैसे कॉलेजियम के माध्यम से सिफारिश के आधार पर नियुक्तियां, तो हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में महिलाओं का प्रतिनिधित्व अचानक कम हो जाता है।

उन्होंने कहा कि न्यायिक सेवाओं में वस्तुनिष्ठ मानदंडों के आधार पर महिलाओं की अच्छी भागीदारी दिखाई देती है, लेकिन उच्च न्यायिक पदों पर पहुंचने के दौरान यह अनुपात लगातार घटता जाता है।

उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस बीवी नागरत्ना का भी उल्लेख किया और कहा कि वह उनकी महिला सहकर्मी रही हैं।

जस्टिस भुइयां की इन टिप्पणियों ने न्यायपालिका में महिलाओं के प्रतिनिधित्व, सीनियर एडवोकेट के रूप में नामांकन और कॉलेजियम की कार्यप्रणाली में समावेशिता को लेकर एक महत्वपूर्ण चर्चा सामने रखी है।

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