गुजरात हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने शुक्रवार (30 अक्टूबर) को सोमनाथ मंदिर के आसपास मांसाहारी भोजन की बिक्री पर प्रतिबंध लगाने वाली राज्य सरकार की अधिसूचना बहाल की।

बता दें, यह आदेश सिंगल जज द्वारा अधिसूचना रद्द किए जाने के कुछ ही घंटे बाद आया। डिवीजन बेंच ने सिंगल जज के फैसले पर रोक लगाते हुए कहा कि गिर-सोमनाथ के जिला मजिस्ट्रेट द्वारा 10 अगस्त को जारी अंतिम अधिसूचना अगली सुनवाई तक प्रभावी रहेगी।

एक्टिंग चीफ जस्टिस मनाश रंजन पाठक और जस्टिस निर्झर एस. देसाई की बेंच ने राज्य सरकार की तत्काल अपील पर शाम 5:30 बजे विशेष सुनवाई की।

बेंच ने कहा कि प्रतिवादियों के वकील सुप्रीम कोर्ट या किसी अन्य हाईकोर्ट का ऐसा कोई फैसला नहीं बता सके, जिसमें इस मामले में इसके विपरीत दृष्टिकोण अपनाया गया हो। दीपावली और गुजराती नववर्ष के दौरान सोमनाथ मंदिर में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के आने की संभावना को देखते हुए बेंच ने प्रतिबंध जारी रखने का आदेश दिया।

कोर्ट ने जिला मजिस्ट्रेट, गिर-सोमनाथ द्वारा गुजरात पुलिस अधिनियम, 1951 की धारा 33(1)(w) के तहत 10 अगस्त को जारी अंतिम अधिसूचना को अगली सुनवाई की तारीख 25 नवंबर 2026 तक प्रभावी रखा है।

साथ ही, जस्टिस निशा एम. ठाकोर द्वारा उसी दिन स्पेशल सिविल एप्लीकेशन में पारित आदेश पर आगे के आदेश तक रोक लगाई।

इससे पहले शुक्रवार को जस्टिस निशा एम. ठाकोर ने रेस्तरां संचालकों की याचिका स्वीकार करते हुए जिला मजिस्ट्रेट की अधिसूचना रद्द की। इस अधिसूचना के तहत सोमनाथ मंदिर के आसपास 500 मीटर के दायरे और सात सार्वजनिक मार्गों पर मांसाहारी खाद्य पदार्थों की तैयारी, बिक्री और भंडारण पर प्रतिबंध लगाया गया था।

सिंगल जज ने कहा था कि गुजरात पुलिस अधिनियम की धारा 33(1)(w) सार्वजनिक मनोरंजन स्थलों के लाइसेंस और नियंत्रण को विनियमित करने का अधिकार देती है, लेकिन इसके आधार पर जिला मजिस्ट्रेट किसी रेस्तरां में परोसे जाने वाले भोजन पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगा सकते।

कोर्ट के अनुसार, यह प्रावधान खाद्य विकल्पों पर रोक लगाने या किसी वैध व्यापार को पूरी तरह बंद करने का अधिकार नहीं देता।

याचिकाकर्ता रेस्तरां संचालकों ने जिला मजिस्ट्रेट की 10 अगस्त की अधिसूचना को चुनौती दी थी। इससे पहले 10 जुलाई को प्रारंभिक अधिसूचना जारी कर सार्वजनिक सड़कों के दोनों ओर स्थित लॉरी स्टॉल, दुकानों, रेस्तरां और होटलों में मांस, मटन, मछली तथा अन्य मांसाहारी व्यंजनों की तैयारी, बिक्री और भंडारण पर रोक लगाने का प्रस्ताव रखा गया। आम लोगों से 30 दिनों के भीतर आपत्तियां और सुझाव मांगे गए। इसके बाद 10 अगस्त को अंतिम अधिसूचना जारी कर सोमनाथ मंदिर से 500 मीटर के भीतर सहित अधिसूचना में बताए गए विभिन्न क्षेत्रों में प्रतिबंध लागू कर दिया गया।

सिंगल जज ने अपने फैसले में कहा कि प्रतिबंध का आधार सड़क पर मांसाहारी भोजन दिखाई देने से समाज के कुछ वर्गों की धार्मिक भावनाएं आहत होने की आशंका थी। हालांकि, सड़क पर मांसाहारी भोजन का प्रदर्शन न होना संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत आवश्यक धार्मिक प्रथा नहीं माना जा सकता।

कोर्ट ने भगवद्गीता के अध्याय 17 का उल्लेख करते हुए कहा था कि उसमें भोजन को सात्विक, राजसिक और तामसिक गुणों के आधार पर वर्गीकृत किया गया, लेकिन इससे अन्य प्रकार के भोजन पर पूर्ण प्रतिबंध का निष्कर्ष नहीं निकलता।

कोर्ट ने कहा था कि हिंदू धर्म एकरूप नहीं है और भोजन संबंधी पसंद तथा परंपराएं अलग-अलग क्षेत्रों में भिन्न हो सकती हैं। मांसाहारी भोजन करना व्यक्तिगत पसंद का विषय है। ऐसे में पूर्ण प्रतिबंध याचिकाकर्ताओं के संविधान के अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत व्यापार और व्यवसाय करने के मौलिक अधिकार का उल्लंघन करता है।

सिंगल जज ने यह भी कहा था कि खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम के तहत संबंधित प्राधिकरण खाद्य कारोबार के लाइसेंस और संचालन को विनियमित कर सकते हैं। हालांकि, रेस्तरां संचालकों के लाइसेंस में ऐसी कोई शर्त नहीं दिखाई गई, जिसके आधार पर मांसाहारी भोजन की बिक्री पर पूर्ण रोक लगाई जा सके।

कोर्ट के अनुसार, धार्मिक भावनाओं और व्यापार के मौलिक अधिकार के बीच संतुलन बनाने के लिए कम प्रतिबंधात्मक उपाय अपनाए जा सकते थे। याचिकाकर्ताओं ने आश्वासन दिया था कि वे नियमों का पालन करेंगे और सड़क पर मांसाहारी भोजन प्रदर्शित नहीं करेंगे।

कोर्ट ने गुजरात पुलिस अधिनियम की संबंधित धारा का विश्लेषण करते हुए कहा था कि इसका उद्देश्य सार्वजनिक मनोरंजन स्थलों के लाइसेंस और नियंत्रण के जरिए सार्वजनिक व्यवस्था, सुरक्षा और स्वास्थ्य बनाए रखना है। यह प्रावधान अधिकारियों को भोजन संबंधी पसंद तय करने या किसी वैध कारोबार पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का अधिकार नहीं देता।

कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया था कि गुजरात अधिनियम संख्या 8, 2018 के जरिए सार्वजनिक मनोरंजन स्थल की परिभाषा से 'ईटिंग हाउस' शब्द हटा दिया गया।

सिंगल जज ने रेस्तरां संचालकों को निर्देश दिया कि उनके प्रतिष्ठानों के दरवाजे बंद रहें और उन पर गहरे रंग का कांच लगाया जाए, ताकि सड़क से गुजरने वाले लोगों को जानवरों के शव या मांस दिखाई न दें। साथ ही, रसोई और परिसर के भीतर स्वच्छता के उच्च मानक बनाए रखने को कहा गया।

राज्य सरकार की ओर से अपील में एडवोकेट जनरल कमल त्रिवेदी ने दलील दी कि कानून के तहत उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।

उन्होंने कहा कि दीपावली और गुजराती नववर्ष के दौरान लाखों श्रद्धालु सोमनाथ मंदिर और आसपास के धार्मिक स्थलों पर पहुंच सकते हैं।

राज्य की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि संबंधित क्षेत्रों में मांस और मछली की बिक्री से श्रद्धालुओं की भावनाएं आहत हो सकती हैं और असुविधा या अन्य जोखिम पैदा हो सकते हैं।

डिवीजन बेंच ने अपील पर नोटिस जारी करते हुए अगली सुनवाई 25 नवंबर 2026 तय की है। राज्य सरकार को प्रतिवादी नंबर 7 को स्पीड पोस्ट और सीधे नोटिस की तामील कराने के निर्देश दिए गए। तब तक जिला मजिस्ट्रेट की 10 अगस्त की अधिसूचना लागू रहेगी और सिंगल जज का आदेश स्थगित रहेगा।



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