जाति-आधारित अपमान 'सार्वजनिक रूप से' नहीं हुआ, चश्मदीद गवाह ने अभियोजन का समर्थन नहीं किया: SC/ST Act के तहत बरी का फैसला बरकरार
गुजरात हाईकोर्ट ने जाति-सूचक शब्द इस्तेमाल करने और शिकायतकर्ता के साथ मारपीट करने के आरोपी तीन लोगों को बरी करने का फैसला बरकरार रखा। कोर्ट ने पाया कि चश्मदीद गवाह ने अभियोजन पक्ष के इस दावे का समर्थन नहीं किया कि कथित अपमानजनक शब्द सार्वजनिक रूप से अपमान करने के इरादे से कहे गए थे। [2026 LiveLaw (Guj) 274]
आरोप है कि आरोपियों को पता था कि शिकायतकर्ता अनुसूचित जाति (चमार समुदाय) से है, इसलिए उन्होंने जानबूझकर सार्वजनिक रूप से शिकायतकर्ता के खिलाफ जाति-सूचक शब्दों का इस्तेमाल किया, जो अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम (SC/ST Act) की धारा 3(1)(10) के तहत दंडनीय अपराध है। यह भी आरोप है कि आरोपियों ने डंडों से शिकायतकर्ता के साथ मारपीट की थी। ट्रायल कोर्ट ने आरोपियों को बरी कर दिया था, जिसके खिलाफ राज्य सरकार हाईकोर्ट गई।
जस्टिस हेमंत एम. प्रच्छक ने अपने आदेश में कहा कि अभियोजन पक्ष द्वारा पेश किए गए तीन पुलिस अधिकारियों के बयानों से ऐसा लगा कि अभियोजन पक्ष 'अत्याचार निवारण अधिनियम' की धारा 3(1)(10) की मुख्य शर्तों को संदेह से परे साबित नहीं कर पाया।
कोर्ट ने कहा,
"जैसा कि माननीय सुप्रीम कोर्ट ने हाल के एक फैसले में कहा, अभियोजन पक्ष को 'अत्याचार निवारण अधिनियम' की धारा 3(1)(10) की मुख्य शर्तों को साबित करना होता है। खास तौर पर, यह साबित होना चाहिए कि आरोपी ने संबंधित व्यक्ति का अपमान करने के इरादे से सार्वजनिक स्थान पर या सार्वजनिक रूप से अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया। ऐसी स्थितियों में ही धारा 3(1)(10) के तहत अपराध साबित हो सकता है। इस मामले में किसी भी गवाह ने सार्वजनिक स्थान पर या सार्वजनिक रूप से प्रतिवादी-आरोपियों द्वारा अपमानजनक शब्दों के इस्तेमाल के बारे में कुछ नहीं कहा है।"
कोर्ट ने कहा कि शिकायतकर्ता के अलावा, अभियोजन पक्ष के किसी भी गवाह ने ऊपर बताई गई बातों का ज़िक्र नहीं किया और न ही यह कहा कि प्रतिवादी-आरोपियों ने शिकायतकर्ता को कोई चोट पहुंचाई। कोर्ट ने कहा कि चश्मदीद गवाह ने भी अभियोजन पक्ष के मामले का बिल्कुल भी समर्थन नहीं किया।
कोर्ट ने कहा,
"इसलिए इन सभी तथ्यों पर विचार करने के बाद, ट्रायल कोर्ट ने अपने फैसले के पैराग्राफ 11 और 12 में गवाहों के बयानों को समझने के बाद विस्तार से कारण बताए और इस नतीजे पर पहुंचा कि अभियोजन पक्ष प्रतिवादी-आरोपियों के खिलाफ आरोप साबित करने में बुरी तरह नाकाम रहा। मामले के तथ्यों और फैसले व आदेश पर विचार करते हुए मैं ट्रायल कोर्ट के निष्कर्षों से पूरी तरह सहमत हूं।"
मारपीट के आरोपों के बारे में कोर्ट ने कहा कि शिकायतकर्ता - जो एक प्लंबर है - को लगी चोटें प्लंबिंग का काम करते समय भी लग सकती थीं।
कोर्ट ने कहा,
"यहां तक कि दाहिने अंगूठे के पास लगी चोट भी पाइप-फिटिंग या प्लंबिंग का काम करते समय लग सकती थी। इस तरह ऐसा लगता है कि शिकायतकर्ता द्वारा बताई गई चोटों की पुष्टि मेडिकल सबूतों से नहीं होती है।"
हाईकोर्ट ने कहा कि मौजूदा आरोपियों को कथित अपराध से जोड़ने के लिए "कोई विश्वसनीय सबूत नहीं" है और रिकॉर्ड पर मौजूद सबूत इतने ठोस नहीं हैं कि यह साबित किया जा सके कि आरोपियों ने ही कथित अपराध किया।
कोर्ट ने राज्य की अपील खारिज की और कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपियों पर लगाए गए आरोपों को बिना किसी संदेह के साबित करने में बुरी तरह नाकाम रहा।
Case Title : STATE OF GUJARAT v/s HEMTIBEN ISHWARJI THAKOR & ORS