अडानी मानहानि केस: पत्रकार रवि नायर की अतिरिक्त सबूत पेश करने की अर्ज़ी पर सुनवाई से हाईकोर्ट जज ने खुद को अलग किया
गुजरात हाईकोर्ट के जज जस्टिस एस.वी. पिंटो ने मंगलवार (13 अक्टूबर) को पत्रकार रवि नायर की उस अर्ज़ी पर सुनवाई से खुद को अलग कर लिया, जिसमें उन्होंने सेशंस कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसने अडानी एंटरप्राइजेज़ लिमिटेड द्वारा दायर मानहानि केस से जुड़े अतिरिक्त सबूत रिकॉर्ड पर लाने की उनकी अर्ज़ी को खारिज कर दिया था।
अडानी एंटरप्राइजेज़ लिमिटेड ने आपराधिक मानहानि का केस दायर करते हुए आरोप लगाया कि रवि नायर ने ऐसे कई ट्वीट प्रकाशित और प्रसारित किए जिनमें झूठे और मानहानि करने वाले बयान है, जिनका मकसद AEL और अडानी ग्रुप की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाना है।
10.02.2026 को मनसा के ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट फर्स्ट क्लास ने नायर को मानहानि के अपराध का दोषी ठहराया और उन्हें एक साल की साधारण कैद और 5,000 रुपये का जुर्माना भरने की सज़ा सुनाई।
इससे नाराज़ होकर, नायर ने सेशंस कोर्ट में अपील दायर की। इसके बाद उन्होंने सेशंस कोर्ट में लंबित अपील में अतिरिक्त सबूत पेश करने की अनुमति के लिए अर्ज़ी दायर की, जिसे सेशंस कोर्ट ने 22 जुलाई को खारिज किया। इसके खिलाफ़ उन्होंने हाईकोर्ट का रुख किया।
जब मंगलवार को मामला सुनवाई के लिए आया तो जस्टिस एस.वी. पिंटो ने अपने आदेश में कहा,
"यह मामला इस कोर्ट के समक्ष नहीं सुना जाएगा।"
नायर का कहना है कि ट्रायल के दौरान, शिकायतकर्ता ने खुद कुछ ट्वीट पेश किए। हर मामले में एक "न्यूज़ लिंक" फ़ील्ड भी दिखाया था, जिसमें उस थर्ड-पार्टी न्यूज़ रिपोर्ट का ज़िक्र था, जिसका हवाला ट्वीट में दिया गया; साथ ही, उन्होंने दो लेखों को पूरी तरह से एग्ज़िबिट 61 और 62 के तौर पर पेश किया था। उनका दावा है कि जो सामग्री आवेदक अब पेश करना चाहता है, वह कोई नया सबूत नहीं है।
अर्ज़ी में दावा किया गया कि यह सामग्री उन थर्ड-पार्टी न्यूज़ रिपोर्ट का पूरा टेक्स्ट है जिनकी पहचान शिकायतकर्ता के अपने एग्ज़िबिट 46 से 60 में पहले ही की जा चुकी है। इसमें कहा गया कि सच्चाई और जनहित मानहानि के मामलों में बचाव के पूरे आधार हैं और कोर्ट उन आरोपों की सच्चाई या आवेदक की नेक नीयती की जांच तब तक नहीं कर सकता जब तक कि उन स्रोतों की जांच न की जाए जिन पर उसने भरोसा किया।
यह तर्क दिया गया कि ट्रायल के दौरान आवेदक का बचाव पक्ष क्रॉस-एग्जामिनेशन के ज़रिए शिकायतकर्ता के सबूतों की मज़बूती को परखना था। यह निर्दोष होने की धारणा और इस नियम के अनुरूप था कि आरोपी पर अपनी बेगुनाही साबित करने का कोई बोझ नहीं होता; इसीलिए उसने बचाव पक्ष की ओर से औपचारिक सबूत पेश न करने का फ़ैसला किया।
हालांकि, उसने 06.11.2025 को CrPC की धारा 313 के तहत अपने बयान में शपथ लेकर कहा था कि वह "बहस के चरण में अपने बचाव के समर्थन में दस्तावेज़ी सबूत पेश करेगा।"
यह कहा गया कि अंतिम बहस के चरण में आवेदक ने ट्रायल कोर्ट के सामने सोर्स मटीरियल पेश किया। इसकी पुष्टि ट्रायल कोर्ट के अपने फ़ैसले से भी होती है, जिसके पैरा 25 में शिकायतकर्ता का यह बयान दर्ज है कि आवेदक "पहली बार अंतिम बहस के चरण में दस्तावेज़ी सामग्री पर भरोसा करना चाहता है।"
हालांकि, याचिका में कहा गया कि ट्रायल कोर्ट ने आवेदक द्वारा पेश की गई सामग्री को स्वीकार करने या न करने का कोई आदेश पारित नहीं किया। यह कहा गया कि ट्रायल कोर्ट का फ़ैसला आवेदक द्वारा पेश किए गए दस्तावेज़ों की स्वीकार्यता के सवाल पर कोई बात नहीं करता; बल्कि सीधे यह निष्कर्ष निकालता है कि "आरोपी ने आरोपों की सच्चाई साबित करने के लिए कोई स्वतंत्र सबूत पेश नहीं किया... कोई दस्तावेज़ी सामग्री, आधिकारिक रिकॉर्ड या सत्यापित डेटा पेश नहीं किया गया।"
याचिका में कहा गया कि CrPC की धारा 314 के तहत, अंतिम बहस के चरण में किसी दस्तावेज़ को औपचारिक रूप से 'एग्ज़िबिट' (सबूत) के तौर पर चिह्नित करने की कोई प्रक्रिया नहीं है; क्योंकि सबूत पेश करने का चरण पहले ही पूरा हो चुका था, इसलिए बचाव पक्ष के वकील के पास सामग्री को कोर्ट के सामने रखने और बहस में उस पर भरोसा करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है।
इसके बाद जब आवेदक ने अतिरिक्त सबूत पेश करने की अनुमति मांगने वाली अर्ज़ी दाखिल करके दस्तावेज़ पेश करने की कोशिश की तो सेशंस कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि CrPC की धारा 391 के तहत बहुत सावधानी बरतने की ज़रूरत होती है, जो CPC के ऑर्डर 41 रूल 27 के समान है। दूसरी बात, आवेदक को ट्रायल के दौरान उचित मौका मिला था और उसने "जानबूझकर" उसका इस्तेमाल नहीं किया। साथ ही बिना औपचारिक अर्ज़ी के अंतिम बहस में दस्तावेज़ों का ज़िक्र करना काफ़ी नहीं है, क्योंकि उन्हें कभी भी "रिकॉर्ड पर दाखिल" नहीं किया गया। इस याचिका में ट्रायल कोर्ट के फ़ैसले को रद्द करने की मांग की गई। साथ ही, इसमें यह भी मांग की गई कि याचिकाकर्ता की उस अर्ज़ी को मंज़ूरी दी जाए, जिसमें तीसरे पक्ष की न्यूज़ रिपोर्ट और 'एग्ज़िबिट 46 से 62' में बताई गई दूसरी चीज़ों को अतिरिक्त सबूत के तौर पर पेश करने की बात कही गई।
इससे पहले, हाईकोर्ट ने नायर की उस याचिका को बंद किया, जिसमें उन्होंने अपनी गिरफ़्तारी को चुनौती दी। यह गिरफ़्तारी अडानी एंटरप्राइज़ की ओर से दायर मानहानि के मामले में पेश न होने पर सेशंस कोर्ट द्वारा जारी ग़ैर-ज़मानती वारंट के आधार पर की गई।
हाईकोर्ट ने यह फ़ैसला तब लिया जब उसे पता चला कि सेशंस कोर्ट ने नायर को रेगुलर ज़मानत दी है।
Case Title : RAVI NAIR v/s STATE OF GUJARAT & ANR.