'विभाजनकारी प्रवृत्ति' : मुसलमानों के खिलाफ कथित हेट स्पीच पर असम सीएम को हाईकोर्ट का नोटिस
गौहाटी हाईकोर्ट ने गुरुवार (26 फरवरी) को असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के खिलाफ अल्पसंख्यक समुदायों के विरुद्ध कथित घृणास्पद भाषण (हेट स्पीच) देने से रोकने की मांग वाली जनहित याचिका (PIL) और दो संबद्ध मामलों पर नोटिस जारी किया।
चीफ़ जस्टिस अशुतोष कुमार और जस्टिस अरुण देव चौधरी की खंडपीठ ने केंद्र सरकार, असम राज्य, डीजीपी और मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा को नोटिस जारी किया। अदालत ने अंतरिम राहत की मांग पर भी नोटिस दिया और मामले को बिहू अवकाश के बाद सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया।
PIL में क्या कहा गया
असमिया विद्वान डॉ. हीरेन गोहाईं और अन्य द्वारा दायर याचिका में कहा गया है कि मुख्यमंत्री के कथित हेट स्पीच के कई सार्वजनिक वीडियो मौजूद होने के बावजूद असम पुलिस ने स्वतः संज्ञान लेकर कोई एफआईआर दर्ज नहीं की। इससे “दण्डमुक्ति का माहौल” बन रहा है और लोगों में भय का वातावरण पैदा हो रहा है।
याचिका में अदालत से मांग की गई है कि मुख्यमंत्री को ऐसे भाषण देने और नागरिकों को अल्पसंख्यकों के खिलाफ कानून अपने हाथ में लेने के लिए उकसाने से रोका जाए।
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने भी याचिकाकर्ताओं को हाईकोर्ट का रुख करने को कहा था।
अदालत की टिप्पणियाँ
चीफ़ जस्टिस ने सुनवाई के दौरान कहा कि प्रस्तुत बयानों से “विभाजनकारी प्रवृत्ति” (fissiparous tendency) झलकती है।
जब याचिकाकर्ताओं ने मुख्यमंत्री को बयान देने से तत्काल रोकने का अनुरोध किया, तो अदालत ने कहा कि फिलहाल नोटिस जारी किया जा रहा है और याचिका लंबित रहने के दौरान सामान्य संयम अपेक्षित रहेगा।
अदालत ने इस चरण पर भारतीय जनता पार्टी (BJP) को नोटिस जारी करना आवश्यक नहीं माना।
याचिकाकर्ताओं की दलीलें
सीनियर एडवोकेट अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि मुख्यमंत्री के कथित बयान लगातार और दोहराव वाले हैं तथा वे अपने पद की शपथ, संविधान की प्रस्तावना, धर्मनिरपेक्षता और बंधुत्व के सिद्धांतों का उल्लंघन करते हैं।
उन्होंने कहा कि “लव जिहाद” और “धार्मिक रूपांतरण” जैसे मुद्दों पर मुख्यमंत्री की टिप्पणियों का राष्ट्रीय प्रभाव पड़ता है और ऐसे बयान संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के लिए स्वीकार्य नहीं हैं।
डॉ. हीरेन गोहाईं की ओर से सीनियर एडवोकेट सी.यू. सिंह ने कहा कि मुख्यमंत्री ने 2023 से 'मिया मुस्लिम' समुदाय के खिलाफ कई कथित अपमानजनक टिप्पणियां की हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री ने “मिशन बसुंधरा” योजना के संदर्भ में कहा था कि मुगल काल में जबरन इस्लाम में परिवर्तित लोगों को “मूल पहचान” में लौटने पर स्वदेशी दर्जा दिया जा सकता है।
सिंह ने यह भी कहा कि मुख्यमंत्री ने बंगाली मूल के मुस्लिम प्रवासियों को “मिया” कहकर संबोधित किया और कथित तौर पर कहा कि मतदाता सूची पुनरीक्षण के दौरान लाखों “मिया” मतदाताओं के नाम हटाए जाएंगे।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री ने लोगों से “मिया” समुदाय के खिलाफ शिकायतें दर्ज कराने को कहा और यहां तक कि उन्हें परेशान करने जैसी बातें कही।
सीनियर एडवोकेट मीनाक्षी अरोड़ा ने कहा कि मुख्यमंत्री के बयान कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगाड़ सकते हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री ने सब्जियों की कीमत बढ़ने के लिए भी “मिया” समुदाय को जिम्मेदार ठहराया और मुस्लिम पत्रकारों को उनकी धार्मिक पहचान के आधार पर निशाना बनाया।
अरोड़ा ने कहा कि ऐसे बयान किसी समुदाय के खिलाफ हिंसा को उकसाने के समान हैं और अदालत को मुख्यमंत्री को ऐसे बयान देने से रोकने का निर्देश देना चाहिए।
कानूनी आधार
याचिका में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराओं 196 (धर्म आदि के आधार पर वैमनस्य फैलाना), 197 (राष्ट्रीय एकता के खिलाफ आरोप) और 353 (सार्वजनिक उपद्रव फैलाने वाले बयान) के तहत अपराधों की जांच के लिए स्वतंत्र एसआईटी गठित करने की मांग की गई है।
साथ ही पूर्व हाईकोर्ट न्यायाधीश की अध्यक्षता में जांच की निगरानी के लिए आयोग बनाने और यह घोषित करने की मांग भी की गई है कि मुख्यमंत्री ने अपने संवैधानिक पद की शपथ का उल्लंघन किया है।
याचिका में कहा गया है कि अदालत को तुरंत हस्तक्षेप करना चाहिए ताकि यह संदेश न जाए कि असम में हेट स्पीच बिना किसी कार्रवाई के की जा सकती है।
मामले को अप्रैल में सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया है।