परिवार के एक सदस्य को विदेशी घोषित करने से बाकी सदस्य स्वतः विदेशी नहीं हो जाते: गुवाहाटी हाइकोर्ट

Update: 2026-05-11 09:57 GMT

गुवाहाटी हाइकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी परिवार के एक सदस्य को विदेशी घोषित कर देने मात्र से उसके अन्य परिजन स्वतः विदेशी नहीं माने जा सकते। अदालत ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति के खिलाफ अलग से कार्यवाही और संदर्भ आवश्यक है।

जस्टिस संजय कुमार मेधी और जस्टिस शमीमा जहां की खंडपीठ एक महिला की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। महिला ने विदेशी न्यायाधिकरण के 2019 के उस आदेश को चुनौती दी, जिसमें उसे और उसके बेटों-बेटियों को विदेशी घोषित कर दिया गया।

हाईकोर्ट ने महिला को विदेशी घोषित करने का न्यायाधिकरण का फैसला बरकरार रखा, लेकिन उसके बच्चों को विदेशी घोषित करने वाला हिस्सा रद्द कर दिया।

अदालत ने कहा,

“यह कानून का स्थापित सिद्धांत है कि जब तक किसी व्यक्ति के खिलाफ विशेष रूप से संदर्भ शुरू नहीं किया जाता, तब तक किसी विदेशी न्यायाधिकरण द्वारा उसे विदेशी घोषित नहीं किया जा सकता।”

मामला सिलचर स्थित विदेशी न्यायाधिकरण संख्या-4 के 24 मई 2019 के आदेश से जुड़ा है। न्यायाधिकरण ने महिला को 25 मार्च 1971 के बाद भारत में आई विदेशी नागरिक घोषित किया। साथ ही उसके बच्चों को भी विदेशी बताया गया।

रिकॉर्ड के अनुसार कछार जिले के पुलिस अधीक्षक (सीमा शाखा) की ओर से मामला संदर्भित किया गया। न्यायाधिकरण ने माना था कि महिला विदेशी अधिनियम, 1946 की धारा 9 के तहत अपने भारतीय नागरिक होने का भार साबित करने में असफल रही।

महिला की ओर से अदालत में कहा गया कि उसने मतदाता सूची, राष्ट्रीय नागरिक पंजी और अन्य दस्तावेजों के जरिए अपने पिता से संबंध साबित किया। इसलिए उसे भारतीय नागरिक माना जाना चाहिए।

वहीं, राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि विदेशी अधिनियम के तहत नागरिकता साबित करने का पूरा दायित्व संबंधित व्यक्ति पर होता है। राज्य ने दलील दी कि महिला अपने कथित पिता से विश्वसनीय संबंध साबित नहीं कर सकी।

राज्य ने यह भी कहा कि ग्राम पंचायत का प्रमाणपत्र नागरिकता का प्रमाण नहीं माना जा सकता।

हाईकोर्ट ने सुनवाई के बाद कहा कि कानून के अनुसार भारतीय नागरिक होने का भार हमेशा संबंधित व्यक्ति पर ही रहता है और यह दायित्व कभी राज्य पर स्थानांतरित नहीं होता।

अदालत ने माना कि महिला द्वारा पेश किए गए साक्ष्य विदेशी अधिनियम की धारा 9 के तहत आवश्यक मानकों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं थे। इसलिए उसे विदेशी घोषित करने के आदेश में हस्तक्षेप का आधार नहीं बनता।

हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि महिला के बेटों और बेटियों के खिलाफ अलग से कोई संदर्भ या कार्यवाही शुरू नहीं की गई थी। ऐसे में उन्हें विदेशी घोषित करना कानूनन सही नहीं था।

इसी आधार पर हाईकोर्ट ने बच्चों के खिलाफ पारित आदेश को रद्द कर दिया, जबकि महिला के संबंध में विदेशी न्यायाधिकरण का फैसला बरकरार रखा।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह आदेश महिला को नागरिकता संशोधन कानून के तहत उचित आवेदन करने से नहीं रोकेगा। यदि वह आवेदन करती है, तो संबंधित प्राधिकरण उसे कानून के अनुसार विचार करेगा।

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