POCSO मामलों में पूरा प्रवेश या हाइमन फटना जरूरी नहीं: गुवाहाटी हाईकोर्ट ने 20 साल की सजा बरकरार रखी
गुवाहाटी हाईकोर्ट ने POCSO Act के महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया कि यौन उत्पीड़न साबित करने के लिए पूरा प्रवेश या हाइमन का फटना जरूरी नहीं है।
अदालत ने कहा कि मामूली स्तर का प्रवेश भी कानून के तहत भेदक यौन उत्पीड़न माना जाएगा।
हाईकोर्ट ने 9 वर्षीय बच्ची के साथ दुष्कर्म के आरोपी सतीश राय की सजा बरकरार रखते हुए उसकी अपील खारिज की। आरोपी को स्पेशल POCSO कोर्ट ने गंभीर भेदक यौन उत्पीड़न का दोषी मानते हुए 20 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी।
जस्टिस माइकल जोथनखुमा और जस्टिस संजीव कुमार शर्मा की खंडपीठ ने कहा,
“कानून में यौन संबंध और POCSO कानून की धारा 3 के तहत भेदक यौन उत्पीड़न का अर्थ केवल पूर्ण प्रवेश नहीं है। अत्यंत मामूली स्तर का प्रवेश भी इसके दायरे में आता है।”
अदालत ने कहा कि बच्ची की उम्र केवल 9 वर्ष थी। यदि पूर्ण प्रवेश हुआ होता तो गंभीर चोट और हाइमन फटने की संभावना अधिक होती लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि अपराध नहीं हुआ।
मामले में डॉक्टर की रिपोर्ट में हाइमन सुरक्षित पाया गया और हालिया यौन संबंध के स्पष्ट संकेत नहीं मिले थे। हालांकि हाइमन के आसपास लालिमा और छूने पर दर्द की बात सामने आई थी।
हाईकोर्ट ने कहा कि यह स्थिति मामूली स्तर के प्रवेश से भी समझी जा सकती है। अदालत ने यह भी कहा कि बचाव पक्ष ने इस पहलू पर डॉक्टर से कोई प्रभावी सवाल नहीं किया।
आरोपी की ओर से दलील दी गई कि बच्ची ने मजिस्ट्रेट के सामने अपने बयान में केवल गलत काम शब्द का इस्तेमाल किया था, जिससे यौन संबंध साबित नहीं होता।
लेकिन अदालत ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा,
“पीड़िता ने अदालत में स्पष्ट रूप से कहा कि आरोपी ने अपना निजी अंग उसकी योनि में डाला था। केवल इसलिए कि धारा 164 के बयान में उसने 'गलत काम' कहा, उसकी गवाही पर संदेह नहीं किया जा सकता।”
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले का भी हवाला दिया, जिसमें कहा गया कि केवल हाइमन के सुरक्षित होने से यह नहीं माना जा सकता कि दुष्कर्म नहीं हुआ।
अंत में अदालत ने माना कि पीड़िता की गवाही भरोसेमंद है और उससे यह साबित होता है कि आरोपी ने बच्ची के साथ भेदक यौन उत्पीड़न किया। इसी आधार पर ट्रायल कोर्ट की सजा सही ठहराते हुए अपील खारिज की गई।