तलाक के फैसले के खिलाफ अपील लंबित रहने के दौरान पत्नी अंतरिम गुजारा भत्ता पाने की हकदार: दिल्ली हाईकोर्ट

Update: 2026-07-15 07:15 GMT

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत तलाक के फैसले के खिलाफ अपील लंबित रहने के दौरान पत्नी अंतरिम गुजारा भत्ता पाने की हकदार है। कोर्ट ने माना कि अपील असल में वैवाहिक कार्यवाही का ही आगे का हिस्सा है।

जस्टिस विवेक चौधरी और जस्टिस रेनू भटनागर की बेंच ने आर्मी ऑफिसर को निर्देश दिया कि वह अपनी पत्नी को अंतरिम गुजारा भत्ता देना जारी रखे। यह भत्ता उसकी ग्रॉस सैलरी (कुल वेतन) का 30% होगा (कानूनी कटौती के बाद) और यह भुगतान तब तक जारी रहेगा जब तक कि शादी खत्म करने के फैसले को चुनौती देने वाली पत्नी की अपील पर सुनवाई चल रही है।

कोर्ट ने कहा,

"सिर्फ इसलिए कि ट्रायल कोर्ट ने अपना फैसला सुना दिया, कार्यवाही अंतिम नहीं हो जाती; यह तब तक जारी और लंबित रहती है जब तक कि अपील के सभी रास्ते खत्म न हो जाएं। इसलिए HMA की धारा 24 में 'कार्यवाही' शब्द का अर्थ अपील के चरण को भी शामिल करने वाला माना जाना चाहिए।"

दोनों की शादी दिसंबर 2012 में हुई। पति भारतीय सेना में ऑफिसर हैं। उन्होंने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(ia) और (ib) के तहत तलाक की कार्यवाही शुरू की थी। उस कार्यवाही के दौरान, फैमिली कोर्ट ने पति के नियोक्ता (employer) को निर्देश दिया कि वह उसकी ग्रॉस सैलरी का 30% काटकर 18 मई, 2022 से पत्नी को अंतरिम गुजारा भत्ते के तौर पर दे। बाद में हाईकोर्ट ने भी उस आदेश को सही ठहराया।

जुलाई 2025 में फैमिली कोर्ट द्वारा तलाक का आदेश (डिक्री) जारी करने के बाद पत्नी ने उस आदेश को चुनौती देते हुए हाई कोर्ट का रुख किया और पहले से मिल रहे अंतरिम गुजारा भत्ते को जारी रखने की मांग की।

याचिका का विरोध करते हुए पति ने तर्क दिया कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24 स्पष्ट रूप से अंतरिम गुजारा भत्ते को "कार्यवाही के दौरान" की अवधि तक सीमित करती है और फैमिली कोर्ट द्वारा आदेश (डिक्री) पारित करने के बाद यह प्रावधान लागू नहीं रहता। उसने तर्क दिया कि इसके बाद पत्नी के पास उपाय अधिनियम की धारा 25 के तहत उपलब्ध है, जो स्थायी गुजारा भत्ता (एलिमनी) और मेंटेनेंस से संबंधित है। इस दलील को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि अपील मूल कार्यवाही का ही एक हिस्सा है। कोर्ट ने यह भी कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम के तहत अपील की कार्यवाही, धारा 24 में इस्तेमाल किए गए शब्द "इस अधिनियम के तहत कोई भी कार्यवाही" के दायरे में आती है।

कोर्ट ने कहा,

"जब अपीलकर्ता फैमिली कोर्ट्स एक्ट की धारा 19 के तहत इस कोर्ट में तलाक के आदेश को चुनौती देती है तो वह उसी कार्यवाही में एक पक्ष के तौर पर ऐसा करती है, जो HMA नंबर 15/2022 के दाखिल होने के साथ शुरू हुई। मामले का विषय, पक्षकार और कार्रवाई का कारण वही रहता है।"

बेंच ने पति द्वारा हवाला दिए गए सुप्रीम कोर्ट के सुखदेव सिंह बनाम सुखबीर कौर मामले के फैसले से अलग राय रखी। बेंच ने कहा कि उस फैसले में हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24 और 25 के बीच अंतर पर बात की गई, न कि इस बात पर कि क्या अपील लंबित रहने के दौरान धारा 24 के तहत गुजारा-भत्ता मिलता रहेगा।

कोर्ट ने कहा,

"यह तर्क कि अपीलकर्ता की फैमिली कोर्ट में HMA की धारा 25 के तहत एक अर्जी लंबित है और उसे उसी उपाय को अपनाना चाहिए, ठोस नहीं है। धारा 25 एक स्वतंत्र प्रावधान है जो आदेश (डिक्री) के समय और उसके बाद लागू होता है। धारा 24 विशेष रूप से कार्यवाही लंबित रहने के दौरान गुजारा-भत्ता देने के लिए बनाई गई, जिसमें मौजूदा अपील भी शामिल है। धारा 25 के तहत उपाय का होना - जिस पर अभी फैसला होना बाकी है और जिसमें काफी समय लग सकता है - अपील की कार्यवाही के दौरान HMA की धारा 24 के तहत अपीलकर्ता के अधिकार को खत्म नहीं करता है। ऐसा न मानने पर अपील के दौरान अपीलकर्ता बिना किसी आर्थिक सहारे के रह जाएगी, और धारा 24 का मकसद ठीक इसी स्थिति को रोकना है।"

कोर्ट ने पति की इस दलील को भी खारिज कर दिया कि पत्नी MBA ग्रेजुएट है और उसे काम करने का अनुभव है, इसलिए वह अपना खर्च खुद उठाने में सक्षम है। शैलजा बनाम खोब्बाना मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए बेंच ने दोहराया कि सिर्फ कमाने की क्षमता होना इस आधार पर गुजारा-भत्ता देने से इनकार करने का कारण नहीं हो सकता कि जीवनसाथी असल में कमाई नहीं कर रहा है।

इसलिए कोर्ट ने पति को निर्देश दिया कि वह अपील का निपटारा होने या अगले आदेश तक मौजूदा दर पर गुजारा-भत्ता देना जारी रखे।

Case title: XXX v. YYY

Tags:    

Similar News