क्या बिना एडमिशन/डिनायल एफिडेविट के लिखित बयान 'नॉन-एस्ट' (अमान्य) है? दिल्ली हाईकोर्ट ने बड़ी बेंच को सौंपा मामला

Update: 2026-04-14 15:58 GMT

दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट (ओरिजिनल साइड) रूल्स, 2018 के तहत लिखित बयान दाखिल करने से जुड़े एक मुद्दे को एक बड़ी बेंच के पास भेजा।

जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद ने इस संदर्भ के लिए निम्नलिखित प्रश्न तैयार किया:

“क्या दिल्ली हाईकोर्ट (ओरिजिनल साइड) रूल्स, 2018 के तहत तय कानूनी समय सीमा के भीतर लिखित बयान दाखिल करना—लेकिन साथ में दस्तावेजों के एडमिशन/डिनायल (स्वीकृति/अस्वीकृति) का एफिडेविट न होना—कानून की नज़र में उस फाइलिंग को 'नॉन-एस्ट' (अमान्य) बना देता है? या फिर, क्या ऐसे एफिडेविट का न होना एक ऐसा दोष है, जिसमें सुधार संभव है, जिसके तहत दस्तावेजों के एडमिशन/डिनायल का एफिडेविट बाद में दाखिल करने पर लिखित बयान को रिकॉर्ड पर लिया जा सकता है?”

बेंच ने यह संदर्भ तब दिया, जब वह एक अपील पर सुनवाई कर रही थी। इस अपील में जॉइंट रजिस्ट्रार के उस आदेश को चुनौती दी गई, जिसमें साउथ दिल्ली म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन (SDMC) द्वारा दाखिल लिखित बयान को रिकॉर्ड पर लेने से मना कर दिया गया। इसका आधार यह था कि दस्तावेजों के एडमिशन/डिनायल का अनिवार्य एफिडेविट, तय समय सीमा (120 दिन) बीत जाने के बाद दाखिल किया गया।

कोर्ट ने गौर किया कि हालांकि लिखित बयान 120 दिन की अधिकतम समय सीमा के भीतर ही दाखिल किया गया, लेकिन उसके साथ एडमिशन/डिनायल का एफिडेविट नहीं था; यह एफिडेविट तय समय सीमा खत्म होने के बाद दाखिल किया गया।

कोर्ट ने इस मुद्दे पर समान अधिकार वाली बेंचों के विरोधाभासी फैसलों की जांच की: फैसलों के एक समूह का मानना ​​था कि अनिवार्य एफिडेविट के बिना लिखित बयान को रिकॉर्ड पर बिल्कुल भी नहीं लिया जा सकता। ऐसी फाइलिंग को 'नॉन-एस्ट' (अमान्य) माना जाना चाहिए; जबकि फैसलों के दूसरे समूह का मानना ​​था कि यह एक ऐसा दोष है जिसमें सुधार संभव है—बशर्ते लिखित बयान खुद कानूनी समय सीमा के भीतर दाखिल किया गया हो और उस दोष को बाद में ठीक कर लिया गया हो।

यह देखते हुए कि नियम 3 में "shall" (अनिवार्य रूप से) शब्द का इस्तेमाल एफिडेविट दाखिल करने को अनिवार्य बनाता है, कोर्ट ने टिप्पणी की कि बिना ऐसे एफिडेविट के लिखित बयान को स्वीकार करने की अनुमति देना, इस प्रावधान को ही बेमानी (निष्प्रभावी) बना सकता है।

इसके साथ ही कोर्ट ने इस मुद्दे पर अलग-अलग न्यायिक व्याख्याओं को स्वीकार किया और इस प्रश्न को एक बड़ी बेंच के पास भेज दिया।

अब यह मामला उचित निर्देशों के लिए चीफ जस्टिस के समक्ष रखा जाएगा।

Case title: VK Sood PIL JV v. South Delhi Municipal Corporation And Ors

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