जस्टिस एसके शर्मा के कोर्ट का बहिष्कार करने पर अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया को चुनाव लड़ने से अयोग्य ठहराने की मांग
दिल्ली हाईकोर्ट में PIL दायर की गई, जिसमें AAP नेताओं अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और दुर्गेश पाठक को कोई भी चुनाव लड़ने से अयोग्य ठहराने की मांग की गई। यह मांग दिल्ली आबकारी नीति मामले में जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की कोर्ट की कार्यवाही में शामिल होने से इनकार करने और कथित तौर पर सोशल मीडिया पर उनकी मानहानि करने के कारण की गई।
सतीश कुमार अग्रवाल नाम के एक व्यक्ति द्वारा दायर इस याचिका में भारत निर्वाचन आयोग (ECI) को आम आदमी पार्टी का पंजीकरण रद्द करने का निर्देश देने की भी मांग की गई।
इस मामले की सुनवाई बुधवार को जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की खंडपीठ करेगी।
बता दें, मंगलवार को एक अन्य पीठ ने केजरीवाल, सिसोदिया, पाठक और AAP के अन्य नेताओं को आपराधिक अवमानना के नोटिस जारी किए। यह कार्रवाई तब की गई जब जस्टिस शर्मा ने उनके खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू की थी।
यह कदम तब उठाया गया, जब जस्टिस शर्मा ने मामले से खुद को अलग करने (Recusal) की कार्यवाही के संबंध में याचिकाकर्ताओं द्वारा सोशल मीडिया पर साझा किए गए विभिन्न पोस्ट और वीडियो का संज्ञान लिया।
उन्होंने इससे पहले केजरीवाल और अन्य लोगों द्वारा दायर मामले से खुद को अलग करने की याचिकाओं को खारिज किया था। इसके बावजूद, उन्होंने शराब नीति मामले को किसी अन्य सिंगल जज को सौंप दिया।
PIL में अग्रवाल ने यह तर्क दिया कि AAP नेताओं का कथित आचरण हाई कोर्ट के अधिकार और गरिमा को कम करता है। यह 'जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951' की धारा 29A के तहत राजनीतिक दलों के उस दायित्व का उल्लंघन है, जिसके अनुसार उन्हें भारत के संविधान के प्रति "सच्ची आस्था और निष्ठा" रखनी होती है।
यह याचिका उन मीडिया रिपोर्टों पर आधारित है, जिनमें केजरीवाल, सिसोदिया और पाठक द्वारा दिए गए उन बयानों का ज़िक्र है जो जस्टिस शर्मा द्वारा आबकारी नीति मामले की सुनवाई से खुद को अलग करने की याचिकाओं को खारिज किए जाने के बाद दिए गए।
अग्रवाल ने आरोप लगाया कि AAP नेताओं का कोर्ट में "या तो व्यक्तिगत रूप से या विधिवत अधिकृत कानूनी प्रतिनिधि के माध्यम से" पेश होने से परहेज़ करने का निर्णय, "न्याय प्रशासन, न्यायिक अनुशासन, संवैधानिक शासन और कानून की उचित प्रक्रिया के पालन से जुड़े गंभीर और महत्वपूर्ण प्रश्न" खड़े करता है।
याचिकाकर्ता ने यह तर्क दिया कि न्यायिक आदेशों से असंतुष्ट वादियों के पास अपीलीय अदालतों में जाने का उपाय मौजूद होता है, और वे "कोर्ट की कार्यवाही का बहिष्कार" नहीं कर सकते। याचिका के अनुसार, AAP नेताओं द्वारा अदालत के सामने - चाहे व्यक्तिगत रूप से या किसी अधिकृत वकील के माध्यम से - पेश होने से कथित इनकार या एकतरफ़ा फ़ैसला, अगर सही पाया जाता है तो यह सीधे तौर पर न्यायिक प्रक्रिया की पवित्रता, उसे लागू करने की क्षमता और उसके अधिकार पर चोट करता है, और न्याय के सुचारू प्रशासन को कमज़ोर करता है।
याचिका में कहा गया,
“न्यायिक कार्यवाही में हिस्सा लेना - जब किसी पक्ष को विधिवत समन भेजा गया हो या उसे पेश होने की आवश्यकता हो - न्याय प्रशासन को नियंत्रित करने वाले संवैधानिक और वैधानिक ढांचे के तहत अनिवार्य है; और इसे तब तक वैकल्पिक नहीं माना जा सकता, जब तक कि किसी सक्षम अदालत द्वारा कानून के अनुसार विशेष रूप से छूट न दी गई हो।”
यह याचिका वकील बरुण कुमार सिन्हा के माध्यम से दायर की गई।
Title: SH. SATISH KUMAR AGGARWAL v. UNION OF INDIA & ORS