साढ़े चार साल की कैद के बाद खुर्रम परवेज को जमानत, दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा- व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार सर्वोपरि
दिल्ली हाईकोर्ट ने गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत दर्ज कथित आतंक वित्तपोषण मामले में कश्मीरी मानवाधिकार कार्यकर्ता खुर्रम परवेज को जमानत दी।
अदालत ने कहा कि लगभग साढ़े चार वर्षों की लंबी कैद, मुकदमे की धीमी प्रगति और संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार उन्हें जमानत दिए जाने के पक्ष में महत्वपूर्ण आधार हैं।
जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस रविंद्र दुडेजा की खंडपीठ ने 17 दिसंबर 2024 को ट्रायल कोर्ट द्वारा जमानत याचिका खारिज किए जाने के आदेश को चुनौती देने वाली अपील स्वीकार करते हुए यह राहत प्रदान की।
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि खुर्रम परवेज 22 नवंबर 2021 से हिरासत में हैं और मामला अभी आरोप तय करने की दलीलों के चरण में ही है। साथ ही अभियोजन पक्ष ने 197 गवाहों को पेश करने की बात कही, जिससे मुकदमे के जल्द पूरा होने की संभावना बेहद कम दिखाई देती है।
खंडपीठ ने कहा,
"अपीलकर्ता के अनुच्छेद 21 के तहत प्राप्त अधिकारों का संतुलन बनाए रखना आवश्यक है और ये अधिकार UAPA की धारा 43डी(5) के तहत लगाए गए प्रतिबंधों पर भी वरीयता प्राप्त कर सकते हैं।"
अदालत ने प्रथम दृष्टया आरोपों का परीक्षण करते हुए पाया कि अभियोजन पक्ष का मामला काफी हद तक सह-आरोपी मुनीर अहमद कटारिया के बयान पर आधारित है, जो बाद में सरकारी गवाह बन चुका है। अदालत ने कहा कि उसकी गवाही की सत्यता का परीक्षण अभी मुकदमे के दौरान होना बाकी है।
हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि वह आरोपों के गुण-दोष पर कोई अंतिम राय व्यक्त नहीं कर रही है। अदालत के अनुसार अभियोजन और बचाव पक्ष की दलीलों की वास्तविक जांच मुकदमे के दौरान ही होगी।
राष्ट्रीय जांच एजेंसी के अनुसार प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े एक नेटवर्क द्वारा ओवर ग्राउंड वर्करों की भर्ती, सुरक्षा प्रतिष्ठानों की जानकारी जुटाने और आतंक वित्तपोषण गतिविधियों को अंजाम दिया जा रहा था। इसी जांच के दौरान खुर्रम परवेज को गिरफ्तार किया गया जबकि उनका नाम मूल FIR में शामिल नहीं था।
आरोपपत्र में दावा किया गया कि परवेज ने कथित रूप से ओवर ग्राउंड वर्करों की भर्ती की, सेना की गतिविधियों और संरचना से जुड़ी जानकारी एकत्र की, पाकिस्तान स्थित आतंकवादी संगठनों से संबंध बनाए तथा वर्ष 2016 में बुरहान वानी की मौत के बाद विरोध प्रदर्शनों को उकसाया।
दूसरी ओर, खुर्रम परवेज ने अदालत में कहा कि उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों के समर्थन में कोई ठोस साक्ष्य नहीं है। उनका तर्क था कि किसी प्रतिबंधित संगठन के सदस्य के साथ उनके संपर्क का कोई डिजिटल प्रमाण नहीं मिला है और कथित बैठकों को लेकर कोई कॉल रिकॉर्ड भी प्रस्तुत नहीं किया गया।
उन्होंने यह भी कहा कि ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है, जिससे यह साबित हो कि उन्होंने किसी आतंकवादी को संवेदनशील सैन्य जानकारी उपलब्ध कराई हो। साथ ही उनके खिलाफ किसी कथित आतंक वित्तपोषण नेटवर्क से जुड़े धन के लेनदेन का भी कोई आरोप या प्रमाण मौजूद नहीं है।
इन परिस्थितियों को देखते हुए दिल्ली हाइकोर्ट ने खुर्रम परवेज को जमानत देने का आदेश पारित किया।