'पगड़ी' देने से किरायेदारी कभी खत्म न होने वाली नहीं बन जाती, मकान-मालिक अब भी बेदखली की मांग कर सकता है: दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि किरायेदार द्वारा 'पगड़ी' (लंबे समय तक किरायेदारी के अधिकार पाने के लिए एक बार में दी जाने वाली रकम) का भुगतान करने से किरायेदारी कभी खत्म न होने वाली नहीं बन जाती और इससे मकान-मालिक और किरायेदार के बीच के बुनियादी रिश्ते में कोई बदलाव नहीं आता।
जस्टिस नीना बंसल कृष्णा एक दुकान से जुड़े विवाद की सुनवाई कर रही थीं, जिसे 1 जनवरी, 2001 के किराये के समझौते के तहत अपीलकर्ता को किराये पर दिया गया।
अपीलकर्ता का दावा था कि किराये के समझौते के अलावा, दोनों पक्षों ने समझौता ज्ञापन (MoU) भी किया, जिसके तहत मकान-मालकिन को पगड़ी के तौर पर 1.48 लाख रुपये मिले, जो दुकान की बाजार कीमत का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा था।
किराये के समझौते और MoU का हवाला देते हुए किरायेदार ने तर्क दिया कि पगड़ी के भुगतान से एक ऐसी किरायेदारी बनी, जो हमेशा चलती रहेगी और कभी खत्म नहीं होगी, जिससे मकान-मालिक बेदखली की मांग नहीं कर सकता।
इस तर्क को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि इस बात पर कोई विवाद नहीं है कि दुकान किराये पर देते समय मकान-मालकिन को पगड़ी की रकम मिली। हालांकि, कोर्ट ने कहा कि मुख्य मुद्दा यह था कि क्या इस भुगतान से किरायेदारी की प्रकृति बदल गई।
कोर्ट ने कहा,
"इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि दुकान किराये पर देते समय वादी/प्रतिवादी ने पगड़ी की रकम ली थी। इसलिए सवाल यह उठता है कि क्या पगड़ी की रकम लेने से किरायेदारी कभी खत्म न होने वाली बन जाती है... असल में, यह किरायेदारी कभी खत्म न होने वाली नहीं थी।"
कोर्ट ने यह भी गौर किया कि किराये के समझौते में ही किरायेदार को दो महीने का नोटिस देकर किरायेदारी खत्म करने का अधिकार दिया गया।
इस प्रकार, कोर्ट ने अपील खारिज की और मकान-मालकिन के पक्ष में बेदखली का आदेश बरकरार रखा।
Case title: M/S Shyam Lal & Sons v. Smt. Mithlesh Devi