भारत-विरोधी गतिविधियों के आरोपी OCI कार्डधारक को भारत आने की अनुमित नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट

Update: 2026-08-12 04:14 GMT

दिल्ली हाईकोर्ट ने 81 साल के 'ओवरसीज सिटिज़न ऑफ़ इंडिया' (OCI) कार्डधारक को भारत आने की अंतरिम अनुमति देने से इनकार किया। उन पर "कश्मीर-समर्थक अलगाववादी गतिविधियों" और "भारत-विरोधी प्रचार" में शामिल होने का आरोप है, जिसके कारण उन्हें ब्लैकलिस्ट किया जा रहा है। वे परिवार में शादी के कार्यक्रमों में शामिल होने के लिए भारत आना चाहते थे।

चीफ जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की डिवीज़न बेंच ने कहा कि खालिद जहांगीर काज़ी नाम के इस व्यक्ति के पक्ष में अंतरिम राहत देने के लिए कोई मज़बूत शुरुआती मामला (prima facie case) नहीं बनता है।

कोर्ट ने उनकी वह अंतरिम अर्ज़ी खारिज की, जो उनके OCI कार्ड को रद्द करने और केंद्र सरकार द्वारा उन्हें ब्लैकलिस्ट करने के मामले में दायर अपील के साथ लगाई गई।

काज़ी ने नवंबर 2024 में सिंगल जज के उस आदेश को चुनौती दी थी जिसमें 'कारण बताओ नोटिस' (Show Cause Notice), OCI रद्द करने का आदेश और ब्लैकलिस्ट करने का आदेश रद्द कर दिया गया था। साथ ही अधिकारियों को निर्देश दिया गया कि वे किसी भी प्रस्तावित प्रतिबंध या रद्दीकरण के आधार को स्पष्ट रूप से बताते हुए नया नोटिस जारी करें।

केंद्र सरकार और काज़ी, दोनों ने ही इस फैसले को 'इंट्रा-कोर्ट अपील' (कोर्ट के भीतर की अपील) में चुनौती दी। इन क्रॉस-अपीलों की अंतिम सुनवाई 24 अगस्त को होनी है।

यह नई अर्ज़ी तब सामने आई, जब काज़ी ने सुप्रीम कोर्ट से अगस्त-सितंबर के दौरान श्रीनगर में परिवार की शादियों में शामिल होने के लिए भारत आने की अनुमति मांगी।

सुप्रीम कोर्ट ने उनकी याचिका का निपटारा करते हुए हाईकोर्ट से अनुरोध किया कि वे अंतरिम राहत के लिए उनकी अर्ज़ी पर जल्द से जल्द फैसला करें।

हालांकि डिवीज़न बेंच ने उन्हें अंतरिम राहत देने से इनकार किया, लेकिन उसने अपीलों में तय किए जाने वाले कानूनी सवाल भी तैयार किए। ये सवाल 'सिटिज़नशिप एक्ट' (नागरिकता कानून) और 'फॉरेनर्स एक्ट' (विदेशी नागरिक कानून) के बीच आपसी संबंध और इस बात पर केंद्रित हैं कि क्या एक कानून के प्रावधान दूसरे कानून पर हावी होंगे?

कोर्ट ने पाया कि शुरुआती तौर पर सिटिज़नशिप एक्ट और फॉरेनर्स एक्ट अलग-अलग क्षेत्रों में काम करते हैं और सिटिज़नशिप एक्ट की धारा 7D के तहत मिलने वाले सुरक्षा उपाय (Safeguards) फॉरेनर्स एक्ट के तहत होने वाली कार्यवाही में अपने-आप लागू नहीं किए जा सकते।

कोर्ट ने कहा,

"इस बात की पुष्टि 'इमिग्रेशन एंड फॉरेनर्स एक्ट, 2025' की धारा 7 से भी होती है। यह धारा 'फॉरेनर्स एक्ट' की धारा 3 के समान (pari materia) है और बाद का कानून होने के बावजूद इसमें सिटिज़नशिप एक्ट की धारा 7D के तहत परिकल्पित सुरक्षा उपायों को शामिल नहीं किया गया।"

बता दें, नागरिकता अधिनियम की धारा 7D केंद्र सरकार को OCI कार्डधारक का रजिस्ट्रेशन रद्द करने का अधिकार देती है। विदेशी नागरिक अधिनियम की धारा 3 भारत सरकार को विदेशी नागरिकों के भारत में प्रवेश, प्रस्थान और उपस्थिति को रोकने, विनियमित करने या प्रतिबंधित करने का अधिकार देती है।

प्रथम दृष्टया राय व्यक्त करते हुए बेंच ने कहा कि दोनों कानूनों के तहत निर्धारित प्रक्रियाएं अलग-अलग कानूनी व्यवस्थाओं के तहत काम करती हैं और उनके अलग-अलग परिणाम होते हैं।

बेंच ने आगे कहा कि विवादित फैसले में सिंगल जज द्वारा दोनों कानूनों के बीच संबंध पर जो राय ली गई, उस पर अपीलों में सावधानीपूर्वक विचार करने की आवश्यकता है, क्योंकि ऐसी राय के व्यापक परिणाम हो सकते हैं।

इसके अलावा, बेंच ने अंतरिम चरण में अधिकारियों द्वारा सीलबंद लिफाफों में जमा की गई सामग्री की जांच न करना उचित समझा, यह देखते हुए कि यह सामग्री अपीलों की अंतिम सुनवाई के चरण में ही विचार के लिए प्रासंगिक होगी। तदनुसार, बेंच ने सीलबंद लिफाफे वापस कर दिए।

अदालत ने कहा,

"ऐसे निर्णय के लंबित रहने और प्रतिवादियों के इस दावे को ध्यान में रखते हुए कि रद्दीकरण आदेश और ब्लैकलिस्टिंग आदेश से संबंधित सामग्री अलग-अलग थी और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी थी, सुविधा का संतुलन प्रतिवादियों के पक्ष में है, जिन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा, अखंडता, संप्रभुता और व्यापक जनहित की रक्षा करने का काम सौंपा गया।"

अंततः अदालत ने माना कि काज़ी ऐसा मजबूत प्रथम दृष्टया मामला बनाने में विफल रहे, जो अदालत को उन्हें अंतरिम राहत देने के लिए मना सके, जिससे उन्हें अपीलों में जटिल मुद्दों पर विचार और निर्णय होने तक भारत यात्रा करने की अनुमति मिल सके।

अदालत ने कहा,

"चूंकि अपीलकर्ता और प्रतिवादी दोनों ने विवादित फैसले को उन मुद्दों पर चुनौती दी, जो सीधे तौर पर अपीलकर्ता के भारत में प्रवेश करने के अधिकार से जुड़े हैं, इसलिए अपीलकर्ता को भारत आने की ऐसी कोई भी अनुमति देने से पहले उन सवालों का अंतिम रूप से निर्णय किया जाना चाहिए। इस चरण में अंतरिम राहत देने से अपीलकर्ता द्वारा मांगी गई अंतिम राहत के साथ काफी हद तक ओवरलैप होगा और इससे राष्ट्रीय हित से जुड़ी विशिष्ट चिंताओं को उठाने वाली प्रतिवादियों की अपीलों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा, जो सर्वोपरि है।"

Title: KHALID JAHANGIR QAZI THROUGH HIS POWER OF ATTORNEY HOLDER MS FARIDA SIDDIQI v. UNION OF INDIA THROUGH SECRETARY MINISTRY OF HOME AFFAIRS & ANR & Other Connected Matters

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