इंश्योरेंस कवर नोट की फोटोकॉपी मात्र वैध इंश्योरेंस पॉलिसी के होने का सबूत नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि अगर इंश्योरेंस कंपनी यह सबूत पेश कर दे कि दुर्घटना में शामिल वाहन के लिए कोई कवर नोट जारी ही नहीं किया गया था, तो केवल कवर नोट की फोटोकॉपी दिखा देने से यह साबित नहीं हो जाता कि कोई वैध इंश्योरेंस पॉलिसी मौजूद है।
जस्टिस अनीश दयाल ने कहा कि मोटर दुर्घटना मुआवजे के मामलों में 'संभावनाओं की प्रबलता' (Preponderance of Probabilities) का सिद्धांत लागू होता है, लेकिन केवल इसी आधार पर इंश्योरेंस कंपनी को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। इसके लिए इंश्योरेंस कॉन्ट्रैक्ट (बीमा अनुबंध) का सबूत होना जरूरी है।
कोर्ट ने कहा,
"सिर्फ कवर नोट की फोटोकॉपी पेश कर देने को एक वैध इंश्योरेंस पॉलिसी होने का पर्याप्त सबूत नहीं माना जा सकता।"
कोर्ट ने यह टिप्पणी अरुणा अत्री द्वारा दायर अपील खारिज करते हुए की। अरुणा अत्री ने मोटर एक्सीडेंट क्लेम्स ट्रिब्यूनल (MACT) के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड को मुआवजे की जिम्मेदारी से मुक्त कर दिया गया था। यह मामला सड़क दुर्घटना में ललित अत्री की मौत से जुड़ा था।
ट्रिब्यूनल ने दावा करने वालों को 41.23 लाख रुपये का मुआवजा और उस पर 7.5% सालाना ब्याज देने का आदेश दिया। इसके लिए ट्रक ड्राइवर और मालिक को संयुक्त रूप से जिम्मेदार ठहराया।
कोर्ट के सामने विवाद यह था कि क्या इंश्योरेंस कंपनी को उस कवर नोट के आधार पर जिम्मेदार ठहराया जा सकता है, जिसे कंपनी ने फर्जी और बनावटी बताया।
दावा करने वालों का तर्क था कि इंश्योरेंस कंपनी ने कथित फर्जी कवर नोट के बारे में अपनी शिकायत पर तुरंत कोई कार्रवाई नहीं की। उन्होंने यह भी कहा कि एक ही कवर नोट नंबर अलग-अलग लोगों और अलग-अलग वाहनों के लिए जारी किए गए थे, जिससे इंश्योरेंस कंपनी के अधिकारियों की मिलीभगत का शक होता है।
कोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया कि शिकायत पर तुरंत कार्रवाई न करने से कवर नोट असली साबित हो जाता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसी चूक की वजह से किसी फर्जी दस्तावेज को असली नहीं माना जा सकता। अदालत ने गौर किया कि बीमा कंपनी ने कथित तौर पर फर्जी कवर नोट के संबंध में मार्च 2012 में शिकायत दर्ज कराई थी, जो दिसंबर 2007 में हुई दुर्घटना के लगभग पांच साल बाद की गई। हालांकि, अदालत ने माना कि केवल इस देरी के आधार पर यह साबित नहीं होता कि दुर्घटना में शामिल वाहन के लिए कोई वैध बीमा पॉलिसी मौजूद थी।
अदालत ने यह भी ध्यान दिया कि दावा करने वालों (क्लेमेंट) ने जिस कवर नोट को आधार बनाया, वह केवल एक फोटोकॉपी थी; न तो मूल कवर नोट और न ही मूल बीमा पॉलिसी पेश की गई थी। अदालत ने यह भी पाया कि दुर्घटना में शामिल वाहन के लिए बीमा प्रीमियम के भुगतान का कोई सबूत नहीं है।
अदालत ने आगे कहा कि दावा करने वाले 'मोटर वाहन अधिनियम, 1988' की धारा 169 का सहारा ले सकते थे, ताकि संबंधित दस्तावेजों को पेश करने के लिए कहा जा सके और कवर नोट की असलियत साबित करने के लिए फोरेंसिक या अन्य विशेषज्ञों की राय ली जा सके। हालांकि, अदालत ने कहा कि ऐसा कोई कदम नहीं उठाया गया।
अपील खारिज करते हुए अदालत ने फर्जी कवर नोट से जुड़े मामलों की जांच करने की बीमा कंपनियों की जिम्मेदारी पर जोर दिया।
अदालत ने कहा,
"इसमें कोई संदेह नहीं है कि बीमा कंपनी का यह कर्तव्य है कि यदि उसे कोई फर्जी या जाली कवर नोट मिलता है तो वह उचित कार्रवाई करे—जैसे कि शिकायत दर्ज कराना और कानून के अनुसार मामले को आगे बढ़ाना। यह बताने की जरूरत नहीं है कि फर्जी कवर नोट जारी करना एक गंभीर मामला है, क्योंकि इससे न केवल मुआवजे की कार्यवाही प्रभावित होती है, बल्कि बीमा कंपनी द्वारा जोखिम के आकलन और अनुमान पर भी असर पड़ता है।"
अदालत ने माना कि जैसे ही किसी बीमा कंपनी के संज्ञान में कोई फर्जी कवर नोट आता है, उसे तुरंत उचित कदम उठाने चाहिए, जिसमें शिकायत दर्ज कराना और कानून के अनुसार मामले की पैरवी करना शामिल है।
अदालत ने कहा,
"जब भी बीमा कंपनी को किसी फर्जी कवर नोट के बारे में पता चले तो उसे मामले की तह तक जाने के लिए कदम उठाने चाहिए—जो जनहित में भी है—ताकि यह पता चल सके कि आखिर यह फर्जी कवर नोट क्यों बना और इसके लिए कौन जिम्मेदार था। इससे ऐसी घटनाओं को दोबारा होने से रोकने में मदद मिलेगी। बीमा कंपनियों की यह भी जिम्मेदारी है कि वे आंतरिक जांच शुरू करें ताकि यह पता लगाया जा सके कि बिना उचित प्रक्रिया के ऐसा कवर नोट कैसे जारी हुआ या कैसे हासिल किया गया। साथ ही दोषी अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक या दंडात्मक कार्रवाई की जानी चाहिए।"
Case Title : ARUNA ATTRI AND ORS v. SONU KASHYAP AND ORS (ORIENTAL INSURANCE CO LTD)