बड़ी संख्या में प्रभावित निवेशकों का होना क्रिप्टो विवाद को पब्लिक लॉ का मामला नहीं बनाता: दिल्ली हाईकोर्ट

Update: 2026-07-08 04:50 GMT

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि सिर्फ़ इसलिए कि बड़ी संख्या में निवेशक प्रभावित हुए, क्रिप्टोकरेंसी एक्सचेंज से जुड़े निजी विवाद को पब्लिक लॉ (सार्वजनिक कानून) का मामला नहीं माना जा सकता, जिसके लिए रिट अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल किया जाए।

क्रिप्टोकरेंसी प्लेटफ़ॉर्म BitBNS के यूज़र्स की अपील खारिज करते हुए कोर्ट ने एक्सचेंज में कथित साइबर घटना और फंड के गलत प्रबंधन की CBI या स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) से जांच कराने का आदेश देने से इनकार कर दिया।

चीफ़ जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की डिवीज़न बेंच ने सिंगल जज के उस फ़ैसले को बरकरार रखा, जिसमें रिट याचिका पर सुनवाई करने से इनकार किया गया। बेंच ने कहा कि यह विवाद व्यक्तिगत निवेशकों और एक निजी क्रिप्टोकरेंसी एक्सचेंज के बीच हुए लेन-देन से पैदा हुआ।

कोर्ट ने कहा,

"इसलिए यह विवाद एक निजी कमर्शियल विवाद की प्रकृति का है। सिर्फ़ इसलिए कि बड़ी संख्या में निवेशक प्रभावित हुए, यह विवाद अपने आप में ऐसे मामले में नहीं बदल जाता, जिसमें लागू करने योग्य पब्लिक लॉ अधिकार शामिल हों।"

BitBNS क्रिप्टोकरेंसी एक्सचेंज प्लेटफ़ॉर्म के यूज़र्स (अपीलकर्ताओं) ने सिंगल जज के 11 फ़रवरी के फ़ैसले को चुनौती दी थी। उनका तर्क था कि इस मामले में रेगुलेटरी निष्क्रियता, कानूनी निगरानी की कमी और सिस्टम की विफलता शामिल है, जिससे देश भर के निवेशक प्रभावित हुए।

उन्होंने केंद्र सरकार, रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया और अन्य अधिकारियों को क्रिप्टोकरेंसी एक्सचेंजों के लिए एक रेगुलेटरी फ़्रेमवर्क बनाने का निर्देश देने की मांग की। साथ ही, उन्होंने BitBNS में कथित वित्तीय धोखाधड़ी, साइबर हमले, फंड के गलत प्रबंधन और ऑपरेशनल खामियों की CBI जांच की भी मांग की।

उन्होंने अपने फंड को जारी करने और मुआवज़े के भुगतान के लिए भी निर्देश देने की मांग की।

इन दलीलों को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि BitBNS और इसके फ़ाउंडर निजी संस्थाएं हैं और संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत "राज्य" (State) की परिभाषा में नहीं आते हैं।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि फ़ाइनेंस एक्ट, 2022 के तहत वर्चुअल डिजिटल एसेट्स (VDAs) पर टैक्स लगाने से क्रिप्टोकरेंसी एक्सचेंज अपने आप पब्लिक लॉ की जांच के दायरे में नहीं आ जाते हैं।

कोर्ट ने कहा,

"प्रतिवादी संख्या 11 से 13 निजी संस्थाएं हैं, जिन्हें न तो राज्य या राज्य की एजेंसियों ने बनाया है, न ही उन्हें फंड दिया है और न ही उन पर उनका कोई नियंत्रण है। इसके अलावा, फाइनेंस एक्ट के तहत VDA पर टैक्स लगाने से ये संस्थाएं संविधान के अनुच्छेद 12 के अर्थ में 'राज्य' नहीं बन जाती हैं, और न ही इससे वे अपने आप पब्लिक लॉ के तहत जांच के दायरे में आती हैं।"

कोर्ट को ऐसी कोई असाधारण स्थिति भी नहीं मिली जिसके लिए CBI या SIT से जांच का आदेश दिया जा सके।

जहां तक ​​यूज़र्स के फंड को जारी करने और मुआवज़े की मांग का सवाल है, बेंच ने माना कि ऐसे दावों पर फ़ैसला करने के लिए तथ्यों से जुड़े विवादित सवालों को तय करना होगा, जिसके लिए ट्रायल की ज़रूरत होती है और संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत इनका फ़ैसला नहीं किया जा सकता।

आखिर में, यह देखते हुए कि नेशनल साइबर क्राइम पोर्टल पर पहले ही सामूहिक आपराधिक शिकायत दर्ज की जा चुकी है, कोर्ट ने कहा कि अपील करने वालों के पास कानूनी उपाय मौजूद हैं।

इसलिए कोर्ट ने अपील खारिज की।

Case title: Amit Ranjan & Ors. v. Union Of India And Others

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