जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारियों की निगरानी पर दिल्ली हाईकोर्ट की टिप्पणी, कहा- कानूनी प्रावधानों और पुलिस की प्रक्रिया का अध्ययन कर नई याचिका पर करें विचार

Update: 2026-07-28 10:24 GMT

दिल्ली हाईकोर्ट ने मंगलवार (28 जुलाई) को जंतर-मंतर पर नीट पेपर लीक के विरोध में प्रदर्शन कर रहे लोगों की कथित पुलिस निगरानी से जुड़ी जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए याचिकाकर्ता को मौजूदा कानूनी ढांचे का अध्ययन करने और आवश्यकता होने पर नई याचिका दाखिल करने पर विचार करने का मौखिक सुझाव दिया।

चीफ जस्टिस डी. के. उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की खंडपीठ पूर्व जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्रसंघ अध्यक्ष आइशी घोष की ओर से दायर जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी।

याचिका में आरोप लगाया गया कि जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे लोगों की लगातार फोटो और वीडियो बनाए गए तथा उन पर पुलिस की निरंतर निगरानी रखी गई।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने स्थगन की मांग करते हुए कहा कि सीनियर वकील दूसरी अदालत में व्यस्त हैं।

इस पर केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने बताया कि इससे जुड़े अन्य मामले 11 सितंबर को सूचीबद्ध हैं।

इसी दौरान खंडपीठ ने मौखिक रूप से कहा कि याचिकाकर्ता को अदालत के पहले दिए गए सुझाव पर गंभीरता से विचार करना चाहिए, क्योंकि इस विषय पर पहले से कानूनी प्रावधान मौजूद हैं।

अदालत ने कहा कि दिल्ली पुलिस की मानक कार्यप्रणाली (SOP), डिजिटल व्यक्तिगत आंकड़ा संरक्षण कानून और लोक अभिलेख कानून जैसे प्रावधानों का अध्ययन किया जाना चाहिए।

एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ने भी अदालत की इस टिप्पणी से सहमति जताते हुए कहा कि इस मुद्दे पर चार न्यायिक फैसले पहले से मौजूद हैं।

अदालत ने स्पष्ट किया कि वह इस मामले में कथित निगरानी की वैधता पर कोई राय नहीं दे रही है।

खंडपीठ ने कहा कि पहले संबंधित कानूनी प्रावधानों और पुलिस की प्रक्रिया का अध्ययन किया जाए, उसके बाद यह तय किया जाए कि नई याचिका दाखिल करने की आवश्यकता है या नहीं।

खंडपीठ ने कहा,

"हम इस मामले का फैसला नहीं कर रहे हैं। हमारा केवल यह सुझाव है कि याचिकाकर्ता संबंधित कानूनों, दिल्ली पुलिस की मानक कार्यप्रणाली, डिजिटल व्यक्तिगत आंकड़ा संरक्षण कानून और लोक अभिलेख कानून का अध्ययन करें। इसके बाद वे तय कर सकते हैं कि नई याचिका दाखिल करनी है या नहीं।"

इसके बाद अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 25 अगस्त के लिए तय की।

इससे एक दिन पहले भी दिल्ली हाईकोर्ट ने मौखिक रूप से कहा था कि याचिकाकर्ता पुलिस द्वारा प्रदर्शनों के दौरान निगरानी को लेकर दिशा-निर्देश तय कराने के उद्देश्य से अधिक स्पष्ट और व्यापक याचिका दाखिल कर सकते हैं।

सोमवार को केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी थी कि संबंधित प्रदर्शन समाप्त हो चुका है, इसलिए याचिका में मांगी गई राहत अब अप्रासंगिक हो गई।

हालांकि, याचिकाकर्ता का कहना था कि मामला केवल उस प्रदर्शन तक सीमित नहीं है, बल्कि कथित निगरानी को अवैध घोषित करने का भी आग्रह किया गया।

इस पर अदालत ने कहा,

"आप बेहतर तरीके से नई याचिका दाखिल कर सकते हैं। उसमें दिशा-निर्देश तय करने की मांग कर सकते हैं। जो भी व्यवस्था सरकार के पास है, उसे रिकॉर्ड पर लाया जाएगा और उसके बाद उचित आदेश पारित किए जाएंगे।"

सुनवाई के दौरान जब केंद्र की ओर से कहा गया कि जनहित याचिका का इस्तेमाल प्रचार के लिए नहीं किया जा सकता, तब अदालत ने टिप्पणी की कि ऐसी याचिका दाखिल की जानी चाहिए, जिसमें यह जांचा जा सके कि मौजूदा कानूनी प्रावधान पर्याप्त हैं या नहीं।

अदालत के अनुसार वर्तमान याचिका एक विशेष घटना तक सीमित है।

याचिका के अनुसार, 20 जून से जंतर-मंतर पर चल रहे 'कॉकरोच जनता पार्टी' के धरना और अनशन के दौरान प्रदर्शनकारियों पर चौबीसों घंटे निगरानी रखी गई। इसके लिए प्रदर्शन स्थल पर स्थायी निगरानी टावर लगाए जाने का आरोप लगाया गया।

याचिका में कहा गया है कि निगरानी केवल प्रदर्शन तक सीमित नहीं थी, बल्कि प्रदर्शनकारियों के भोजन करने, आराम करने और चिकित्सीय सहायता लेने जैसी सामान्य गतिविधियों की भी फोटो और वीडियो बनाई गईं।

इसमें यह भी आरोप लगाया गया कि निगरानी का इस्तेमाल छात्र प्रदर्शनकारियों को डराने और उनकी पहचान उजागर करने के लिए किया गया, जिससे संविधान के अनुच्छेद 19(1)(क) और 19(1)(ख) के तहत मिले अभिव्यक्ति और शांतिपूर्ण एकत्र होने के अधिकार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

याचिका में महिला प्रदर्शनकारियों की निजता का भी मुद्दा उठाया गया। इसमें आरोप है कि भारी बारिश के दौरान पर्याप्त आश्रय नहीं होने के कारण भीगी हुई अवस्था में मौजूद महिलाओं की भी पुलिसकर्मियों ने फोटो और वीडियो बनाए, जो उनकी गरिमा और निजता का गंभीर उल्लंघन है।

इससे पहले केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत में कहा था कि "हर प्रदर्शन की वीडियो रिकॉर्डिंग कानून-व्यवस्था बनाए रखने की सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है" और "सार्वजनिक स्थान पर निजता का दावा करना विडंबनापूर्ण है।"

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