शिक्षकों से चुनावी ड्यूटी ली जा सकती है लेकिन उन पर असहनीय बोझ नहीं डाला जा सकता: दिल्ली हाईकोर्ट

Update: 2026-07-28 08:41 GMT

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि निर्वाचन आयोग को सरकारी स्कूलों के शिक्षकों की चुनाव संबंधी कार्यों में ड्यूटी लगाने का संवैधानिक अधिकार है लेकिन यह भी सुनिश्चित करना उसकी जिम्मेदारी है कि इससे शिक्षकों पर असहनीय मानसिक और शारीरिक दबाव न पड़े।

चीफ जस्टिस डी. के. उपाध्याय और जस्टिस तुषार राव गेडेला की खंडपीठ मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान के लिए सरकारी स्कूलों के शिक्षकों को बड़े पैमाने पर बूथ स्तरीय अधिकारी और गणना कर्मी के रूप में तैनात किए जाने के खिलाफ दायर जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी।

सुनवाई के दौरान निर्वाचन आयोग ने अदालत को बताया कि उसने विस्तृत हलफनामा दाखिल किया और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पूरी तरह पालन किया जा रहा है। आयोग के अनुसार किसी भी शिक्षक से स्कूल के शिक्षण समय के दौरान चुनाव संबंधी कार्य नहीं कराया जा रहा है।

हाईकोर्ट ने आयोग के इस पक्ष को रिकॉर्ड पर लेते हुए कहा कि शिक्षकों के कार्यभार का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए।

अदालत ने कहा,

"यदि कोई शिक्षक छह से आठ घंटे तक स्कूल में पढ़ाने के बाद चुनावी ड्यूटी भी करता है तो इससे उस पर मानसिक और शारीरिक दबाव पड़ सकता है। इसलिए निर्वाचन आयोग यह सुनिश्चित करे कि चुनाव संबंधी कार्यों के कारण शिक्षकों पर इतना अधिक बोझ न पड़े कि वह असहनीय हो जाए।"

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि निर्वाचन आयोग को संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव संबंधी कार्यों के लिए शिक्षकों की सेवाएं लेने का अधिकार प्राप्त है। हालांकि, बच्चों को निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 की धारा 27 के प्रावधानों की भी अनदेखी नहीं की जा सकती जो शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक कार्यों में लगाने को नियंत्रित करती है।

सुनवाई के दौरान निर्वाचन आयोग की ओर से कहा गया कि शिक्षक स्कूल समय समाप्त होने के बाद बूथ स्तरीय अधिकारी का कार्य करते हैं। इसके अलावा इस अभियान में स्वयंसेवकों की भी तैनाती की गई ताकि नियमित पढ़ाई प्रभावित न हो।

हालांकि, याचिकाकर्ता ने इस दावे का विरोध करते हुए कहा कि यह पूरी तरह गलत है। उनका आरोप है कि जनहित याचिका दायर होने के बाद ही लगभग 10 हजार शिक्षकों को दोबारा स्कूल भेजने के आदेश जारी किए गए, जिससे पहले सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के उल्लंघन की बात स्वीकार होती है।

याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि शिक्षकों को स्कूल के प्रधानाचार्यों और चुनाव अधिकारियों से अलग-अलग निर्देश मिल रहे हैं जिससे भ्रम की स्थिति बनी हुई है।

इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि निर्वाचन आयोग ने अपने हलफनामे के साथ बूथ स्तरीय अधिकारियों और स्वयंसेवकों की संख्या का पूरा विवरण रिकॉर्ड पर रखा है। यदि याचिकाकर्ता इन तथ्यों से असहमत हैं तो उन्हें इसके समर्थन में साक्ष्य सहित अपना हलफनामा दाखिल करना होगा।

सुनवाई के दौरान अदालत ने निर्वाचन आयोग के एक परिपत्र की भाषा पर भी सवाल उठाया।

अदालत ने पूछा कि यदि शिक्षकों से केवल स्कूल समय के बाद चुनावी कार्य कराया जा रहा है तो फिर प्रधानाचार्यों को यह निर्देश देने की आवश्यकता क्यों पड़ी कि चुनावी ड्यूटी के कारण शिक्षकों के खिलाफ कोई कार्रवाई न की जाए।

जब आयोग ने बताया कि शिक्षकों को स्कूल के बाद लगभग पांच घंटे तक बूथ स्तरीय अधिकारी का कार्य करना पड़ सकता है तो हाईकोर्ट ने कहा कि जो शिक्षक पहले ही छह से आठ घंटे तक पढ़ा चुके हों, उनसे कुल 11 घंटे काम लेना उचित नहीं है।

अदालत ने विशेष रूप से महिला शिक्षकों की पारिवारिक जिम्मेदारियों का भी उल्लेख किया।

अदालत ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा,

"हम निर्वाचन आयोग के अधिकारों में कटौती नहीं कर रहे हैं, लेकिन शिक्षकों की परिस्थितियों के प्रति भी संवेदनशील हैं। शिक्षकों से 11 घंटे तक काम लेना उचित नहीं है। व्यवस्था को मानवीय दृष्टिकोण अपनाना होगा।"

इस पर निर्वाचन आयोग ने अदालत को भरोसा दिलाया कि किसी भी शिक्षक पर अत्यधिक कार्यभार न पड़े, इसके लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। शिक्षकों के लिए अल्पाहार की व्यवस्था भी की गई है और विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान अब अंतिम चरण में है।

हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को प्रत्युत्तर हलफनामा दाखिल करने की अनुमति देते हुए मामले की अगली सुनवाई 20 अगस्त को तय की है।

याचिका में मांग की गई कि चुनाव संबंधी कार्यों के लिए शिक्षकों के बजाय गैर-शैक्षणिक कर्मचारियों का अधिक उपयोग किया जाए और शिक्षकों की तैनाती को संतुलित बनाया जाए।

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