जंतर-मंतर के आसपास इंटरनेट बंद करने के खिलाफ दायर जनहित याचिका वापस लेने की अनुमति, दिल्ली हाईकोर्ट ने याचिका का निस्तारण किया
दिल्ली हाईकोर्ट ने सोमवार को जंतर-मंतर के आसपास छात्र आंदोलन के दौरान मोबाइल इंटरनेट सेवाएं बंद किए जाने को चुनौती देने वाली जनहित याचिका वापस लेने की अनुमति दी। प्रदर्शन समाप्त होने के बाद याचिकाकर्ता की ओर से याचिका वापस लेने का अनुरोध किया गया, जिसे कोर्ट ने स्वीकार कर लिया।
चीफ जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने याचिकाकर्ता के वकील की मौखिक प्रार्थना पर याचिका वापस लेने की अनुमति देते हुए मामले का निस्तारण किया।
यह जनहित याचिका सॉफ्टवेयर फ्रीडम लॉ सेंटर, इंडिया की ओर से दायर की गई। इसमें केंद्रीय गृह मंत्रालय के 17, 20, 22 और 23 जुलाई के उन आदेशों को चुनौती दी गई, जिनके तहत जंतर-मंतर और उसके आसपास NEET परीक्षा में कथित अनियमितताओं के खिलाफ चल रहे छात्र आंदोलन के दौरान मोबाइल इंटरनेट सेवाएं अस्थायी रूप से निलंबित कर दी गईं।
याचिका में कहा गया कि इंटरनेट बंद करने के आदेश असंवैधानिक, असंगत और कानून में निर्धारित सुरक्षा उपायों के विपरीत हैं। याचिकाकर्ता का कहना था कि आदेशों में केवल "सार्वजनिक आपातस्थिति" और "लोक सुरक्षा" जैसे वैधानिक शब्दों का उल्लेख किया गया, लेकिन यह नहीं बताया गया कि इंटरनेट बंद करना क्यों आवश्यक था।
याचिका में यह भी तर्क दिया गया कि दूरसंचार अधिनियम, 2023 और दूरसंचार (सेवाओं का अस्थायी निलंबन) नियम, 2024 के तहत प्रशासन को यह साबित करना होता है कि इंटरनेट बंद करना आवश्यक और अनुपातिक कदम था तथा इससे कम कठोर विकल्प उपलब्ध नहीं थे। लेकिन आदेशों में इन पहलुओं पर कोई स्पष्ट कारण नहीं दिया गया।
याचिकाकर्ता ने यह भी कहा था कि इंटरनेट बंद करने के आदेश सार्वजनिक नहीं किए गए, जिससे प्रभावित लोगों के लिए उन्हें अदालत में चुनौती देना मुश्किल हो गया। यह सुप्रीम कोर्ट के अनुराधा भसीन बनाम भारत संघ फैसले की भावना के भी विपरीत है।
याचिका में इंटरनेट बंद करने के आदेश रद्द करने के साथ-साथ संबंधित सरकारी रिकॉर्ड, फाइल नोटिंग, खुफिया सूचनाएं और समीक्षा समिति की कार्यवाही अदालत के समक्ष पेश करने की मांग की गई। इसके अलावा भविष्य में इंटरनेट बंद करने के सभी आदेश लागू होने से पहले या उसी समय सार्वजनिक करने का भी निर्देश देने की मांग की गई।
हालांकि, छात्र आंदोलन समाप्त होने के बाद याचिकाकर्ता ने याचिका वापस लेने का निर्णय लिया, जिसके बाद दिल्ली हाईकोर्ट ने इसे स्वीकार करते हुए मामले का निस्तारण किया।