आरोपी को गिरफ़्तारी के कारणों की जानकारी न देना, गिरफ़्तारी और रिमांड को अमान्य बनाता है: दिल्ली हाईकोर्ट ने POCSO मामले में ज़मानत दी

Update: 2026-03-21 13:50 GMT

दिल्ली हाईकोर्ट ने POCSO मामले में आरोपी को ज़मानत दी। कोर्ट ने कहा कि आरोपी को गिरफ़्तारी के कारणों की जानकारी न देना, गिरफ़्तारी और उसके बाद की रिमांड की कार्यवाही दोनों को ही अमान्य बना देता है।

जस्टिस सौरभ बनर्जी ने कहा कि गिरफ़्तार किए गए व्यक्ति का यह मौलिक अधिकार है कि उसे गिरफ़्तारी के कारणों की जानकारी दी जाए। यह अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 और 22(1) से मिलता है। इस सुरक्षा उपाय का कोई भी उल्लंघन गिरफ़्तारी को गैर-कानूनी बना देता है।

बेंच ने कहा,

"संविधान का अनुच्छेद 21 यह अनिवार्य करता है कि किसी भी व्यक्ति को उसकी निजी स्वतंत्रता से तब तक वंचित नहीं किया जाएगा, जब तक कि कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया का पालन न किया गया हो। इसी से जुड़ा हुआ, संविधान का अनुच्छेद 22(1) यह अनिवार्य करता है कि गिरफ़्तार किए गए व्यक्ति को जल्द से जल्द गिरफ़्तारी के कारणों की जानकारी दी जाए। ऐसा इसलिए ताकि वह कानूनी सहायता लेकर पुलिस रिमांड का विरोध करके ज़मानत मांगकर आदि तरीकों से अपना प्रभावी बचाव कर सके। इस मौलिक सुरक्षा का कोई भी उल्लंघन या अतिक्रमण हमेशा से ही सख़्ती से निंदनीय माना गया।"

यह मामला भारतीय दंड संहिता (IPC), यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम (POCSO Act) और अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम के कई प्रावधानों के तहत दर्ज एक FIR से जुड़ा है। इस मामले में आवेदक पर उन सह-आरोपियों को रहने की जगह (आवास) उपलब्ध कराने में मदद करने का आरोप था, जिन्होंने कथित तौर पर नाबालिग का शोषण किया।

आवेदक ने दलील दी कि उसे गिरफ़्तारी के समय न तो गिरफ़्तारी के कारणों की जानकारी दी गई और न ही उसके बाद उसे ये कारण बताए गए। यह उसके संवैधानिक और वैधानिक अधिकारों का उल्लंघन था। यह तर्क दिया गया कि इस तरह की लापरवाही (नियमों का पालन न करना) पूरी प्रक्रिया को ही अमान्य बना देती है, जिसके आधार पर वह ज़मानत का हकदार है।

दूसरी ओर, राज्य सरकार ने इस याचिका का विरोध किया। सरकार ने तर्क दिया कि आरोप गंभीर प्रकृति के हैं और गिरफ़्तारी के कारणों की लिखित जानकारी न होना, अपने आप में गिरफ़्तारी को गैर-कानूनी नहीं बना देता।

हालांकि, हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी की कि एक बार जब गिरफ़्तार किया गया व्यक्ति इस तरह का कोई आरोप या तर्क उठाता है तो फिर यह ज़िम्मेदारी (बोझ) जांच अधिकारी या एजेंसी पर आ जाती है कि वे यह साबित करें कि उन्होंने नियमों का उचित पालन किया था।

अदालत ने ज़मानत देते हुए कहा,

“मौजूदा मामले में चूंकि राज्य की ओर से पेश APP ने साफ तौर पर यह स्वीकार किया कि गिरफ़्तारी के समय या उसके बाद आवेदक को गिरफ़्तारी के आधार नहीं बताए गए, बल्कि उन्हें काफ़ी बाद में उपलब्ध कराया गया, इसलिए पूरी प्रक्रिया निष्प्रभावी हो जाती है और इसका कोई उद्देश्य पूरा नहीं होगा।”

Case title: Habibur Molla @ Sonu v. State (Govt. Of Nct Of Delhi) & Anr.

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