स्ट्रक्चरल ऑडिट के बिना सिर्फ़ 'देखकर की गई जांच' के आधार पर गिराने का आदेश नहीं दिया जा सकता: दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि दिल्ली म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन एक्ट की धारा 348 और 349 के तहत किसी इमारत को खाली करने और गिराने का आदेश सिर्फ़ देखकर या वर्चुअल जांच के आधार पर नहीं दिया जा सकता। इसके लिए ज़रूरी तकनीकी जानकारी रखने वाले लोगों द्वारा स्ट्रक्चरल जांच जैसी संबंधित तकनीकी जानकारी का होना ज़रूरी है।
(तत्कालीन) चीफ जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की डिवीज़न बेंच उन अपीलों पर सुनवाई कर रही थी, जो MCD के आदेशों के खिलाफ़ दायर की गईं। MCD ने दो इमारतों में रहने वालों को जगह खाली करने और ढांचों को गिराने का आदेश दिया था।
MCD ने इमारतों की "देखकर जांच" (विज़ुअल इंस्पेक्शन) के बाद ये आदेश जारी किए और कहा कि ढांचे जर्जर और खतरनाक हालत में पाए गए हैं।
धारा 348 कमिश्नर को ऐसी इमारत को गिराने, सुरक्षित करने या मरम्मत करने का आदेश देने का अधिकार देती है जो जर्जर हो, गिरने की कगार पर हो, या उसमें रहने वाले या वहां से गुज़रने वाले लोगों के लिए खतरनाक हो। धारा 349 ऐसे भवनों में रहने वालों को जगह खाली करने का आदेश देने से संबंधित है।
कोर्ट ने कहा कि सिर्फ़ यह दर्ज कर लेना कि देखने पर इमारत खतरनाक पाई गई, ऐसी राय बनाने के आधार के तौर पर ज़रूरी जानकारी होने की शर्त को पूरा नहीं करता।
कोर्ट ने कहा,
"हमारी राय में, तकनीकी जानकारी रखने वाले लोगों से किसी तरह का स्ट्रक्चरल ऑडिट या स्ट्रक्चरल जांच कराए बिना सिर्फ़ देखकर या वर्चुअल जांच के आधार पर एक्ट की धारा 348/349 के तहत गिराने या खाली करने का आदेश देने के लिए अधिकारियों द्वारा बनाई गई कोई भी राय, न तो संबंधित मानी जा सकती है और न ही प्रासंगिक।"
साथ ही कोर्ट ने यह भी गौर किया कि रिकॉर्ड में रखी गई तस्वीरों से पता चलता है कि इमारतें खराब हालत में थीं और अपीलकर्ताओं के वकील ने भी माना था कि ऊपरी मंज़िलें असुरक्षित लग रही थीं।
इसलिए कोर्ट ने ढांचों से जुड़े वास्तविक खतरे की संभावना को नज़रअंदाज़ नहीं किया और MCD को नए सिरे से कार्रवाई करने का निर्देश दिया।
कॉर्पोरेशन को निर्देश दिया गया कि वह स्ट्रक्चरल डेटा हासिल करे और दो दिनों के भीतर विशेषज्ञों से इमारतों की जांच कराए। इसके बाद MCD को अंतिम निर्णय लेने का निर्देश दिया गया।
Case Title : Smt Nirmala Devi Garg & Ors. v. Municipal Corporation Of Delhi