दिल्ली हाईकोर्ट ने विरोधियों पर दबाव बनाने के लिए झूठी गवाही की याचिकाओं के गलत इस्तेमाल के खिलाफ चेतावनी दी, CrPC की धारा 340 के तहत अर्जी खारिज की
दिल्ली हाईकोर्ट ने झूठी गवाही (Perjury) की कार्यवाही के बढ़ते गलत इस्तेमाल के खिलाफ आगाह किया। कोर्ट ने कहा कि CrPC की धारा 340 के तहत अर्जियां अब झूठे सबूतों के असली मामलों को सुलझाने के बजाय, विरोधियों पर "दबाव बनाने" और मुकदमों में देरी करने के लिए ज़्यादा दायर की जा रही हैं।
जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद ने पारिवारिक संपत्ति विवाद में एक प्रतिवादी के खिलाफ झूठी गवाही की कार्यवाही शुरू करने की मांग वाली एक अर्जी को खारिज करते हुए यह टिप्पणी की।
यह मामला भाई-बहनों के बीच उनके पिता की मृत्यु के बाद संपत्ति के बंटवारे और हिसाब-किताब के लिए दायर एक मुकदमे से जुड़ा था।
कार्यवाही के दौरान, वादियों ने CrPC की धारा 340 के तहत अर्जी दायर की, जिसमें आरोप लगाया गया कि प्रतिवादी ने शपथ लेकर झूठे बयान दिए हैं और विरासत में मिली संपत्तियों का खुलासा करने वाले हलफनामों में जाली दस्तावेज़ पेश किए।
कोर्ट ने कहा कि ये आरोप मुख्य रूप से हलफनामों और रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री के बीच कथित विसंगतियों पर आधारित थे। हालांकि, कोर्ट ने माना कि ऐसी विसंगतियां अपने आपमें झूठी गवाही की कार्यवाही शुरू करने के लिए ज़रूरी शर्तों को पूरा नहीं करती हैं।
कोर्ट ने कहा,
"वादी नंबर 1 ने केवल हलफनामों और रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री के बीच कुछ विसंगतियों की ओर इशारा किया। इस कोर्ट की राय में ये आरोप अपने आप में CrPC की धारा 340 के तहत आने वाले तत्वों को आकर्षित नहीं करते हैं, जो CrPC की धारा 195(1)(b) के तहत किसी अपराध की जांच शुरू करने का प्रावधान करती है। CrPC की धारा 195(1)(b) सबूत के तौर पर पेश किए गए दस्तावेजों से संबंधित अपराधों के अभियोजन से संबंधित है, यानी IPC की धारा 193 से 196, 199, 200, 205 से 211, 228, 463, 471, 475, 476 के तहत दंडनीय अपराध। इस कोर्ट की राय में इस स्तर पर ये अपराध बनते हुए प्रतीत नहीं होते हैं।"
कोर्ट ने आगे कहा कि हलफनामों में दिए गए बयानों की असत्यता को मौजूदा मुकदमे के दौरान ही साबित करना होगा।
कोर्ट ने राय दी कि यदि मुकदमे की कार्यवाही के दौरान कोई नई सामग्री सामने आती है तो वादी CrPC की धारा 340 के तहत कार्यवाही शुरू करने के लिए हमेशा स्वतंत्र हैं।
अदालत ने कहा,
“इस समय इस अदालत में दायर किए गए अतिरिक्त हलफ़नामों की सच्चाई या अन्यथा की जांच के लिए अदालत CrPC की धारा 340 के तहत और मौजूदा मुक़दमे के तहत दो समानांतर कार्यवाही शुरू करने के पक्ष में नहीं है।”
मामले को समाप्त करते हुए अदालत ने टिप्पणी की,
“अदालत देख रही है कि अब पक्षकारों ने CrPC की धारा 340 के तहत आवेदन दायर करने की एक प्रथा बना ली है, जिसका एकमात्र उद्देश्य दूसरे पक्ष पर दबाव डालना या उन्हें परेशान करना और मुक़दमे में देरी करना है... यह वर्तमान आवेदन केवल इस इरादे से दायर किया गया है ताकि अदालत को इस मामले में आगे बढ़ने से रोका जा सके और प्रतिवादी नंबर 1 को परेशान किया जा सके।”
अतः, अदालत ने आवेदन ख़ारिज किया। मुख्य मुक़दमे की सुनवाई अब 04 अगस्त को अदालत के समक्ष होगी।
Case title: Nisha Chandola & Anr v. Manoj Sharma And Anr