न्यायिक रूप से प्रबंधनीय मानक क्या है?: सी. सदानंदन मास्टर के राज्यसभा नामांकन को चुनौती देने वाली PIL पर हाईकोर्ट का सवाल

Update: 2026-02-25 11:17 GMT

दिल्ली हाईकोर्ट ने बुधवार को उस जनहित याचिका (PIL) पर सवाल उठाए, जिसमें वरिष्ठ भाजपा नेता सी. सदानंदन मास्टर को राज्यसभा के लिए नामित किए जाने को चुनौती दी गई है। याचिका में आरोप है कि उनके पास कानून के तहत आवश्यक “विशेष ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव” का स्पष्ट प्रमाण नहीं है।

चीफ़ जस्टिस डी.के. उपाध्याय और जस्टिस तेजस कारिया की खंडपीठ ने पूछा कि ऐसे मुद्दे का निर्णय करने के लिए क्या कोई न्यायिक रूप से प्रबंधनीय मानक (judicially manageable standard) मौजूद है।

सदानंदन मास्टर को पिछले वर्ष 12 जुलाई को भारत के राष्ट्रपति द्वारा राज्यसभा के लिए नामित किया गया था। उनके साथ सीनियर एडवोकेट उज्ज्वल देवराo निकम, पूर्व विदेश सचिव हर्षवर्धन श्रृंगला तथा इतिहासकार एवं शिक्षाविद् डॉ. मीनाक्षी जैन को भी नामित किया गया था।

यह याचिका एडवोकेट सुभाष थीक्कडन द्वारा दायर की गई है। याचिका में कहा गया है कि मास्टर की नामांकन प्रक्रिया सार्वजनिक रूप से उपलब्ध सामग्री, राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त विशेषज्ञता, शैक्षणिक उपलब्धि या साहित्य, विज्ञान, कला या सामाजिक सेवा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान—जैसा कि संविधान के अनुच्छेद 80(3) में अपेक्षित है—पर आधारित नहीं है।

याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि मास्टर के पास सामाजिक सेवा का कोई विशेष अनुभव नहीं है और वे केवल एक साधारण स्कूल के पूर्व शिक्षक थे, जो बाद में राजनीति में आ गए।

इस पर चीफ़ जस्टिस ने टिप्पणी की—

“इसे कैसे तय किया जाए? क्या हमारे पास यह आकलन करने का कोई न्यायिक मानक है कि कोई व्यक्ति सक्षम है या नहीं? क्या हम यह तय कर सकते हैं कि श्री 'X' साहित्य या कला में विशेषज्ञ हैं या नहीं? ऐसे मुद्दों का न्यायिक मूल्यांकन कठिन है। याचिका दायर करना ठीक है, लेकिन याचिका की ग्राह्यता (maintainability) और न्यायिक परीक्षण योग्य होना (justiciability) अलग-अलग बातें हैं।”

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा, “सचिन तेंदुलकर बेहतर खिलाड़ी थे या विनोद कांबली—यह क्रिकेट विशेषज्ञ बेहतर तय कर सकते हैं, हम नहीं। हमारे पास ऐसी विशेषज्ञता नहीं है।”

केंद्र सरकार की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने कहा कि ऐसे मुद्दे का निर्णय करने के लिए कोई न्यायिक मानक उपलब्ध नहीं है और न ही कोई न्यायिक रूप से मान्य सिद्धांत है। उन्होंने यह भी कहा कि किसी राजनेता के संदर्भ में “सामाजिक सेवा” शब्द का सीधा संबंध हो सकता है।

दोनों पक्षों को सुनने के बाद अदालत ने कहा कि वह तय करेगी कि इस मामले में प्रतिवादियों को नोटिस जारी करना है या नहीं।

याचिका में कहा गया है कि अनुच्छेद 80(3) के तहत आवश्यक योग्यता के स्पष्ट प्रमाण का अभाव गंभीर संवैधानिक चिंता उत्पन्न करता है। इसमें यह भी कहा गया है कि ऐसे व्यक्तियों की पहचान, मूल्यांकन और चयन के लिए कोई पारदर्शी या संरचित प्रक्रिया सार्वजनिक रूप से ज्ञात नहीं है।

याचिकाकर्ता का कहना है कि यह स्पष्ट नहीं है कि क्या कोई वस्तुनिष्ठ मानदंड लागू किए जाते हैं, क्या प्रमाणपत्रों की स्वतंत्र जांच होती है, क्या कारण दर्ज किए जाते हैं या क्या कोई संस्थागत सुरक्षा तंत्र मौजूद है।

याचिका में आशंका जताई गई है कि पारदर्शी प्रक्रिया के अभाव में नामांकन राजनीतिक विवेकाधिकार पर आधारित हो सकता है, न कि योग्यता आधारित संवैधानिक मूल्यांकन पर।

याचिका में यह भी कहा गया कि मनमाने या राजनीतिक रूप से प्रेरित नामांकन राज्यसभा की संस्थागत गरिमा को कमजोर करते हैं और संवैधानिक ढांचे को प्रभावित करते हैं।

सदानंदन मास्टर के नामांकन को चुनौती देने के अलावा याचिका में उन्हें राज्यसभा के नामित सदस्य के रूप में कार्य करने से रोकने की भी मांग की गई है। साथ ही यह निर्देश देने का अनुरोध किया गया है कि राजनीतिक कार्य या पार्टी निष्ठा को अनुच्छेद 80(3) के तहत “सामाजिक सेवा” के समान नहीं माना जा सकता।

याचिका में नामांकन प्रक्रिया के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश बनाने की भी मांग की गई है, ताकि केवल निर्धारित क्षेत्रों में प्रमाणित उत्कृष्टता रखने वाले व्यक्तियों को ही नामित किया जाए।

यह याचिका एडवोकेट विनीत एस. वरकलाविला के माध्यम से दायर की गई है।

Tags:    

Similar News