UPSC परीक्षा में पूर्व अभ्यर्थियों और कोचिंग शिक्षकों को लेखक बनाने पर रोक की मांग, दिल्ली हाईकोर्ट ने जारी किया नोटिस
दिल्ली हाईकोर्ट ने जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) और केंद्र सरकार से जवाब मांगा। याचिका में मांग की गई कि सिविल सेवा परीक्षा में दिव्यांग अभ्यर्थियों के लिए ऐसे लेखकों की नियुक्ति पर रोक लगाई जाए जो पहले कभी UPSC की परीक्षा दे चुके हों या सिविल सेवा परीक्षा की कोचिंग में शिक्षक अथवा प्रशिक्षक रहे हों।
चीफ जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की खंडपीठ ने UPSC के साथ-साथ कार्मिक, लोक शिकायत एवं पेंशन मंत्रालय तथा दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग को नोटिस जारी कर जवाब मांगा।
यह जनहित याचिका दीपस्तंभ फाउंडेशन की ओर से दायर की गई, जो दिव्यांग व्यक्तियों और सिविल सेवा अभ्यर्थियों के साथ काम करने वाला संगठन है।
याचिका में मांग की गई कि सिविल सेवा परीक्षा में लेखक बनने वाले प्रत्येक व्यक्ति से शपथपत्र लिया जाए कि उसने कभी सिविल सेवा परीक्षा नहीं दी है और न ही वह किसी सिविल सेवा कोचिंग संस्थान में शिक्षक या प्रशिक्षक रहा है। यदि कोई व्यक्ति गलत घोषणा करता है तो उसके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की जाए।
याचिका के अनुसार वर्तमान में UPSC की अधिसूचना के तहत लेखक के लिए केवल यह शर्त है कि उसकी शैक्षणिक योग्यता परीक्षा की न्यूनतम योग्यता से अधिक न हो। चूंकि सिविल सेवा परीक्षा के लिए न्यूनतम योग्यता स्नातक है, इसलिए पूर्व अभ्यर्थी और कोचिंग संस्थानों के शिक्षक भी लेखक बन सकते हैं।
याचिका में आरोप लगाया गया कि इससे ऐसे हितों के टकराव वाले लेखक सामने आए हैं जिन्हें परीक्षा के पाठ्यक्रम, प्रश्नों की प्रकृति और उत्तर लेखन की गहरी जानकारी होती है।
याचिकाकर्ता का कहना है कि ऐसे लेखक केवल अभ्यर्थी के बताए उत्तर नहीं लिखते, बल्कि उत्तर की भाषा, संरचना और प्रस्तुति को भी प्रभावित कर सकते हैं। इससे परीक्षा वास्तविक मूल्यांकन के बजाय एक तरह का साझा प्रयास बन जाती है।
याचिका में यह भी दावा किया गया कि यह समस्या सीमित नहीं है, बल्कि UPSC कोचिंग केंद्रों वाले इलाकों में अनौपचारिक रूप से लेखक उपलब्ध कराने की व्यवस्था के कारण व्यापक रूप ले चुकी है।
याचिका के अनुसार, इससे न केवल ईमानदारी से तैयारी करने वाले सामान्य और दिव्यांग अभ्यर्थियों के साथ अन्याय होता है, बल्कि सिविल सेवा जैसी मेरिट आधारित चयन प्रक्रिया की निष्पक्षता और विश्वसनीयता भी प्रभावित होती है।
याचिकाकर्ता ने यह भी बताया कि इस कथित खामी की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए 11 अप्रैल को UPSC को एक अभ्यावेदन भेजा गया था और सुधारात्मक उपाय सुझाए गए, लेकिन अब तक कोई जवाब नहीं मिला।
याचिका में कहा गया कि ऐसे लेखकों को अनुमति देना अभ्यर्थियों के बीच असमानता पैदा करता है, सार्वजनिक भर्ती प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल खड़े करता है और अंततः सिविल सेवाओं की विश्वसनीयता को प्रभावित करता है।