दिल्ली हाईकोर्ट ने मंगलवार को सोशल मीडिया पर दृष्टि IAS कोचिंग इंस्टीट्यूट के फाउंडर और पूर्व सिविल सर्वेंट विकास दिव्यकीर्ति के खिलाफ पोस्ट किए गए डीपफेक और उनकी पहचान का गलत इस्तेमाल करने वाले कंटेंट को हटाने का निर्देश दिया।

जस्टिस अनूप जयराम भंभानी ने कहा कि इस मामले में विस्तृत आदेश जारी किया जाएगा। साथ ही उन्होंने दिव्यकीर्ति की ओर से अपने पर्सनैलिटी राइट्स (व्यक्तित्व अधिकारों) की सुरक्षा के लिए दायर मुकदमे में समन भी जारी किया।

कोर्ट ने उनके अंतरिम निषेधाज्ञा (Interim Injunction) आवेदन पर भी नोटिस जारी किया।

सुनवाई के दौरान, शिक्षक की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट दिया कपूर ने कहा कि यह कॉपीराइट, नैतिक अधिकारों और पर्सनैलिटी राइट्स के उल्लंघन का स्पष्ट मामला है, जिसमें किसी और के कोई विरोधी अधिकार शामिल नहीं हैं।

उन्होंने कहा कि दिव्यकीर्ति इस बात से परेशान थे कि इंस्टाग्राम (जो मेटा प्लेटफॉर्म्स की कंपनी है) पर उनकी तस्वीरों का इस्तेमाल करके उनकी पहचान का गलत इस्तेमाल करने वाले सोशल मीडिया प्रोफाइल बनाए गए।

दिव्यकीर्ति डीपफेक कंटेंट और कॉपीराइट उल्लंघन से भी परेशान हैं, जिसमें लोग उनकी इजाज़त या लाइसेंस के बिना उनके लेक्चर की क्लिप का इस्तेमाल कर रहे हैं। कपूर ने कहा कि ऐसे मामले में 'फेयर यूज़' (उचित उपयोग) का तर्क नहीं दिया जा सकता, क्योंकि लोग लेक्चर की क्लिप का चुनिंदा तरीके से इस्तेमाल कर रहे हैं।

मेटा की ओर से पेश एडवोकेट वरुण पाठक ने कहा कि आपत्तिजनक 13 URL में से 11 को हटाने का निर्देश दिया जा सकता है, जो इंस्टाग्राम रील्स थीं, और गलत जानकारी को हटाया जा सकता है।

हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि दिव्यकीर्ति के पास इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी रूल्स और इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट के तहत एक वैकल्पिक उपाय मौजूद है।

उन्होंने कहा कि IT Act की धारा 46 के तहत, एडजुडिकेटिंग ऑफिसर (निर्णायक अधिकारी) के पास 5 करोड़ रुपये तक के विवादों का निपटारा करने की शक्ति है और सिविल कोर्ट का अधिकार क्षेत्र पूरी तरह से वर्जित है। उन्होंने कहा कि IT रूल्स के तहत कोई व्यक्ति शिकायत अधिकारी (Grievance Officer) से संपर्क कर सकता है और उसके पास अपील करने का भी उपाय है।

कपूर ने जवाब दिया कि शिकायत अपीलीय समिति (Grievance Appellate Committee) पर काम का बहुत ज़्यादा बोझ है और उस मंच पर कुछ नहीं होता है।

उन्होंने कहा कि दिव्यकीर्ति IT Act के उल्लंघन का दावा नहीं कर रहे थे, बल्कि अपने नैतिक और पब्लिसिटी अधिकारों के उल्लंघन का दावा कर रहे थे, जिसके लिए कोर्ट में दावा किया जा सकता है। कोर्ट ने पाठक से इंस्टाग्राम पर इस्तेमाल होने वाले उन टूल्स के बारे में भी सवाल किया, जिनसे किसी व्यक्ति की प्राइवेसी का उल्लंघन हो सकता है।

जज ने कहा,

"मिस्टर पाठक, आप बहुत पावरफुल टूल्स बना रहे हैं। आप उन्हें ऐसे लोगों के हाथों में दे रहे हैं, जो 'घोस्ट' (अज्ञात) हैं। आपको नहीं पता कि इन टूल्स का इस्तेमाल कौन करेगा। आज हमारे देश में अगर किसी को बंदूक रखनी हो तो उसे कई तरह की फॉर्मैलिटीज़ पूरी करनी पड़ती हैं। ये टूल्स बंदूक से भी ज़्यादा खतरनाक हैं। ये मुफ़्त में उपलब्ध हैं और कोई भी इन्हें डाउनलोड कर सकता है।"

यह बात सोशल मीडिया पर अकाउंट बनाने से पहले पर्सनल जानकारी न मांगे जाने और फेक प्रोफ़ाइल के मुद्दे पर चर्चा के दौरान कही गई।

पाठक ने जवाब दिया कि कोई इंटरमीडियरी कानून के तहत ज़रूरी जानकारी से ज़्यादा जानकारी नहीं मांग सकता।

कोर्ट ने मामले में समन जारी किया और कहा कि कंटेंट हटाने (Takedown) के निर्देशों के साथ एक डिटेल्ड ऑर्डर जारी किया जाएगा। कोर्ट ने इंटरमीडियरीज़ को यह भी निर्देश दिया कि वे आपत्तिजनक URL अपलोड करने वालों की बेसिक सब्सक्राइबर जानकारी (BSI) और IP लॉग्स दिव्याकीर्ति को उपलब्ध कराएं।

Title: DR VIKAS DIVYAKIRTI v. META PLATFORMS INC & ORS

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