12 साल पहले सीवर गड्ढे में गिरे लड़के के माता-पिता को मुआवज़ा देने का आदेश, दिल्ली हाईकोर्ट ने बताया- 'घोर प्रशासनिक विफलता'
दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली सरकार और दिल्ली जल बोर्ड को निर्देश दिया कि वे संयुक्त रूप से उस 10 साल के लड़के के माता-पिता को मुआवज़ा दें, जिसकी 2014 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में बिना सुरक्षा वाले सीवर गड्ढे में गिरने से मौत हो गई।
जस्टिस मिनी पुष्करणा ने कहा कि यह दुखद घटना "नागरिक प्रशासन की बुनियादी विफलता" और सार्वजनिक सुरक्षा सुनिश्चित करने में सरकारी अधिकारियों की घोर विफलता को दर्शाती है।
जज ने कहा,
"यह एक ऐसा मामला है, जिसमें सरकारी अधिकारियों ने एक बच्चे की मौत के प्रति उदासीनता दिखाई और एक-दूसरे पर ज़िम्मेदारी डालने की कोशिश की, जबकि उस जगह को सुरक्षित न करने में स्पष्ट लापरवाही बरती गई। खुली और बिना सुरक्षा वाले गड्ढों के कारण वह जगह संभावित खतरे का स्रोत बनी हुई।
जब ऐसी घटनाएं होती हैं, जिनमें छोटे बच्चे सरकारी अधिकारियों द्वारा पर्याप्त सुरक्षा उपाय न करने के कारण अपनी जान गंवा देते हैं तो यह नागरिक प्रशासन की बुनियादी विफलता और नागरिक निकाय की देखभाल के कर्तव्य में घोर विफलता का संकेत है। ऐसी चूक जीवन के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है। इसे पूरी गंभीरता से लिया जाना चाहिए।"
कोर्ट ने ₹16.92 लाख का मुआवज़ा और याचिका दायर करने की तारीख से 9% साधारण ब्याज देने का आदेश दिया। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि हालांकि दिल्ली सरकार और DJB को मुआवज़े का भुगतान करना होगा, लेकिन वे उचित कानूनी कार्यवाही के ज़रिए दूसरे प्रतिवादियों से यह राशि वसूलने के लिए स्वतंत्र होंगे।
यह याचिका मोहम्मद नाज़िम के माता-पिता ने दायर की, जिनकी 27 सितंबर, 2014 को दिल्ली जल बोर्ड के इंटरसेप्टर सीवर प्रोजेक्ट का काम चलने के दौरान एक गहरे सीवर गड्ढे में गिरने से मौत हो गई।
माता-पिता ने मुआवज़े की मांग करते हुए आरोप लगाया कि प्रोजेक्ट में शामिल अधिकारियों और एजेंसियों ने उस जगह को सुरक्षित करने या पर्याप्त चेतावनी संकेत और बैरिकेड लगाने में विफलता दिखाई।
इस प्रोजेक्ट में कई एजेंसियां शामिल थीं। जहां DJB मुख्य नियोक्ता (Principal Employer) था, वहीं इंजीनियर्स इंडिया लिमिटेड (EIL) को प्रोजेक्ट मैनेजमेंट कंसल्टेंट के तौर पर नियुक्त किया गया, और M/s DSCL-Fengshun-Wabag कंसोर्टियम काम कर रहा था। पूरी कार्यवाही के दौरान, प्रतिवादियों ने एक-दूसरे पर ज़िम्मेदारी डालने की कोशिश की। कोर्ट ने गौर किया कि साइट पर सुरक्षा सुनिश्चित करने की ज़िम्मेदारी लेने के बजाय, हर अथॉरिटी ने दोष दूसरों पर मढ़ने की कोशिश की।
अथॉरिटीज़ ने कई आधारों पर याचिका का विरोध किया, जिसमें यह बात भी शामिल थी कि यह घटना के लगभग पाँच साल बाद दायर की गई।
हालांकि, कोर्ट ने माना कि देरी का तर्क मौलिक अधिकारों के उल्लंघन से जुड़े दावे को खारिज करने का आधार नहीं बन सकता, खासकर तब जब याचिकाकर्ता आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग से हों और घटना से जुड़ी आपराधिक कार्यवाही को आगे बढ़ा रहे हों।
कोर्ट ने यह भी कहा कि संवैधानिक अदालतें उन दुखी माता-पिता की मुश्किलों को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकतीं, जिन्होंने सरकारी अधिकारियों की लापरवाही के कारण अपना बच्चा खो दिया हो।
कोर्ट ने कहा,
"दर्द, सदमे और आर्थिक तंगी को केवल कानूनी समय-सीमाओं में नहीं मापा जा सकता।"
इसके साथ ही कोर्ट ने मुआवज़ा देने का आदेश दिया।
Case title: Mohd. Neejam And Anr. v. The State, Govt. Of Nct Of Delhi And Ors.