चीनी वीज़ा घोटाला मामले में कार्ति चिदंबरम की याचिका की सुनवाई से हाईकोर्ट जज ने खुद को अलग किया

Update: 2026-01-23 10:54 GMT

दिल्ली हाईकोर्ट ने चीनी वीज़ा घोटाला मामले में कांग्रेस सांसद कार्ति पी. चिदंबरम द्वारा दायर उस याचिका को 28 जनवरी को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया है, जिसमें उन्होंने उनके खिलाफ आरोप तय किए जाने के ट्रायल कोर्ट के आदेश को चुनौती दी है।

मामला आज जस्टिस गिरीश कथपालिया के समक्ष सूचीबद्ध था। हालांकि, न्यायाधीश ने व्यक्तिगत कारणों का हवाला देते हुए मामले की सुनवाई से खुद को अलग (recuse) कर लिया। उल्लेखनीय है कि इससे पहले इस मामले की सुनवाई से न्यायमूर्ति स्वरना कांता शर्मा और न्यायमूर्ति अनूप जयराम भंभानी भी खुद को अलग कर चुके हैं। इस प्रकार यह मामला आज तीसरे न्यायाधीश के समक्ष सूचीबद्ध हुआ था।

आज की सुनवाई के दौरान कार्ति चिदंबरम की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा पेश हुए। उन्होंने दलील दी कि ट्रायल कोर्ट ने ऐसे अपराध के लिए आरोप तय किए हैं, जिसका आरोप तक याचिकाकर्ता पर लगाया ही नहीं गया है। उन्होंने कहा,

“यह एक ऐसा मामला है जिसमें कोई सबूत नहीं है। मुझे जबरन इस मामले में घसीटा गया है।”

इस पर जस्टिस कथपालिया ने कहा,

“मुझे नहीं लगता कि मैं इस मामले की सुनवाई कर पाऊंगा।”

इसके बाद कोर्ट ने आदेश दिया कि आपराधिक मामलों के प्रभारी न्यायाधीश के आदेश के अधीन इस मामले को 28 जनवरी को किसी अन्य पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया जाए।

कार्ति चिदंबरम ने 23 दिसंबर 2025 को पारित ट्रायल कोर्ट के आदेश को चुनौती दी है, जिसमें विशेष CBI न्यायाधीश ने उनके सहित सात अन्य आरोपियों के खिलाफ आरोप तय किए थे। वहीं, एक आरोपी चेतन श्रीवास्तव को मामले से डिस्चार्ज कर दिया गया था।

अपनी याचिका में चिदंबरम ने कहा है कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई भी सामग्री उपलब्ध नहीं है जिससे उनके खिलाफ संदेह, या गंभीर संदेह भी उत्पन्न हो सके। उन्होंने कहा कि ऐसे में उनके खिलाफ मुकदमा चलाए जाने का कोई औचित्य नहीं है।

याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि ट्रायल कोर्ट ने रिकॉर्ड पर मौजूद दस्तावेज़ों और साक्ष्यों पर न्यायिक मनन नहीं किया और उन साक्ष्यों की पूरी तरह अनदेखी की, जो आपराधिकता के अभाव को दर्शाते हैं। याचिका में कहा गया है कि आरोप तय करने की प्रक्रिया को एक खाली औपचारिकता बना दिया गया।

चिदंबरम ने यह भी कहा कि उनके द्वारा किसी प्रकार की रिश्वत की मांग या स्वीकार नहीं की गई थी और ट्रायल कोर्ट ने यह गलत निष्कर्ष निकाला कि उन्होंने 50 लाख रुपये की मांग की थी।

यह मामला वर्ष 2011 में 263 चीनी नागरिकों को वीज़ा जारी किए जाने से संबंधित है, जब कार्ति चिदंबरम के पिता पी. चिदंबरम देश के गृह मंत्री थे।

CBI के अनुसार, यह मामला वेदांता समूह की सहायक कंपनी तलवंडी साबो पावर लिमिटेड (TSPL) द्वारा कथित तौर पर 50 लाख रुपये की रिश्वत दिए जाने से जुड़ा है। TSPL को पंजाब स्टेट इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड द्वारा मंसा़ ज़िले में 1980 मेगावाट का थर्मल पावर प्लांट स्थापित करने का ठेका दिया गया था और इस परियोजना में चीन की कंपनी शानडोंग इलेक्ट्रिक पावर कंस्ट्रक्शन कॉरपोरेशन (SEPCO) की सहायता ली जा रही थी।

CBI का आरोप है कि परियोजना तय समय से पीछे चल रही थी, जिसके चलते कंपनी को भारी वित्तीय नुकसान होने की आशंका थी। इसी कारण TSPL को SEPCO के चीनी विशेषज्ञों के लिए अतिरिक्त प्रोजेक्ट वीज़ा की आवश्यकता थी।

प्रोजेक्ट वीज़ा अक्टूबर 2010 में केवल पावर और स्टील सेक्टर के लिए शुरू किए गए थे और इनके जारी किए जाने के लिए विस्तृत दिशानिर्देश तय थे। इन दिशानिर्देशों के अनुसार, प्रोजेक्ट वीज़ा के पुनः उपयोग (re-use) की अनुमति सामान्यतः नहीं थी और केवल दुर्लभ व असाधारण परिस्थितियों में, वह भी गृह सचिव और गृह मंत्री की मंज़ूरी से ही संभव थी।

CBI का कहना है कि TSPL की ओर से आरोपी विकास मखारिया ने कार्ति चिदंबरम के करीबी सहयोगी एस. भास्कररमन से संपर्क किया और प्रोजेक्ट वीज़ा के पुनः उपयोग के लिए मदद मांगी। आरोप है कि भास्कररमन के निर्देश पर मखारिया ने अनुरोध पत्र की प्रति ईमेल के माध्यम से भेजी, जिसे आगे कार्ति पी. चिदंबरम को फॉरवर्ड किया गया।

आरोप है कि इसके बाद भास्कररमन ने इस अनुमति को सुनिश्चित कराने के लिए 50 लाख रुपये की अवैध रिश्वत की मांग की, जिसे मखारिया ने स्वीकार किया।

CBI का दावा है कि इस कथित लेन-देन और वीज़ा मंजूरी से जुड़े आरोपों को साबित करने के लिए ईमेल पत्राचार के रूप में पर्याप्त दस्तावेज़ी साक्ष्य मौजूद हैं। एजेंसी के अनुसार, यह अनुमति सभी आरोपियों और कुछ अज्ञात व्यक्तियों एवं लोक सेवकों के बीच रची गई आपराधिक साज़िश का हिस्सा थी, जिसकी जांच अभी जारी है।

Tags:    

Similar News