बेहतर कब्जे का अधिकार साबित करने वाला व्यक्ति संपत्ति वापस पाने का हकदार: दिल्ली हाईकोर्ट

Update: 2026-06-19 09:20 GMT

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि यदि कोई व्यक्ति किसी संपत्ति पर दूसरे पक्ष की तुलना में बेहतर कब्जे का अधिकार (Better Possessory Title) साबित कर देता है, तो वह उस संपत्ति का कब्जा वापस पाने का हकदार होगा, बशर्ते वर्तमान कब्जाधारी अपने कब्जे के लिए कोई वैध या बेहतर अधिकार साबित न कर सके।

जस्टिस नीना बंसल कृष्णा की पीठ ने यह टिप्पणी एक संपत्ति विवाद की सुनवाई के दौरान की। अदालत ने लैटिन सिद्धांत “Possessio contra omnes valet praeter eum cui ius sit possessionis” का हवाला देते हुए कहा कि कब्जा पूरी दुनिया के खिलाफ मान्य होता है, सिवाय उस व्यक्ति के जिसके पास बेहतर अधिकार हो।

मामले में वादी ने दावा किया कि उसने वर्ष 2006 में मूल आवंटी से जीपीए (GPA), एग्रीमेंट टू सेल, हलफनामा, रसीद, कब्जा पत्र और वसीयत के आधार पर संपत्ति खरीदी थी। बाद में उसने वर्ष 2009 में प्रतिवादी को ₹1,500 मासिक किराये पर किरायेदार के रूप में रखा, लेकिन किराया न देने और मकान खाली न करने पर मुकदमा दायर किया।

ट्रायल कोर्ट ने मकान मालिक-किरायेदार संबंध साबित न होने के आधार पर वाद खारिज कर दिया था। हालांकि, प्रथम अपीलीय अदालत ने पाया कि भले ही वादी के दस्तावेज पूर्ण स्वामित्व का प्रमाण नहीं हैं, लेकिन वे मूल आवंटी से प्राप्त बेहतर अधिकार को दर्शाते हैं।

हाईकोर्ट ने अपीलीय अदालत के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि वादी ने आधिकारिक रिकॉर्ड के जरिए मूल आवंटन और अपने पक्ष में निष्पादित दस्तावेजों को साबित कर दिया है। दूसरी ओर, प्रतिवादी न तो संपत्ति पर अपना कोई स्वामित्व अधिकार साबित कर सकी और न ही वैध कब्जे का कोई आधार प्रस्तुत कर सकी।

अदालत ने कहा कि जब दोनों पक्षों के दावों की तुलना की गई तो वादी का कब्जे का अधिकार अधिक मजबूत पाया गया। इसलिए उसे संपत्ति का कब्जा वापस पाने का अधिकार है।

इसी आधार पर हाईकोर्ट ने प्रतिवादी की अपील खारिज कर दी और वादी के पक्ष में कब्जा सौंपने के आदेश को बरकरार रखा।

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