तलाक मामले में पति ने दाख़िल की पत्नी की निजी तस्वीरें: हाईकोर्ट ने 'गंभीर चूक' बताते हुए अवमानना कार्रवाई करने से किया इनकार

Update: 2026-07-02 04:21 GMT

दिल्ली हाईकोर्ट ने तलाक की अर्जी के साथ पत्नी की निजी तस्वीरें दाखिल करने के लिए पति और उसके वकीलों के खिलाफ अवमानना ​​की कार्यवाही शुरू करने से इनकार किया। कोर्ट ने माना कि हालांकि यह काम एक "गंभीर चूक" थी, लेकिन वैवाहिक मामलों में संवेदनशील सामग्री दाखिल करने से जुड़े कोर्ट के निर्देशों की जानबूझकर अनदेखी साबित करने के लिए कोई ठोस सबूत नहीं है। [2026 LiveLaw (Del) 605]

जस्टिस सचिन दत्ता एक अवमानना ​​याचिका पर सुनवाई कर रहे थे, जिसमें 2015 के दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के उल्लंघन का आरोप लगाया गया। उस फैसले में निर्देश दिया गया कि संवेदनशील या निजी प्रकृति के दस्तावेजों को पहले कोर्ट की अनुमति लेकर सीलबंद लिफाफे में पेश किया जाना चाहिए।

याचिकाकर्ता महिला का तर्क था कि प्रतिवादियों ने फैमिली कोर्ट में दायर तलाक की अर्जी के साथ बिना किसी बदलाव (unredacted) के निजी तस्वीरें लगाकर उन निर्देशों का उल्लंघन किया।

हालांकि, हाईकोर्ट ने गौर किया कि प्रतिवादियों का दावा था कि उन्हें उन निर्देशों की जानकारी नहीं थी। इसके अलावा, जब उनसे इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने अपने कार्यों को सही ठहराने की कोशिश नहीं की, बल्कि बिना शर्त माफी मांगी और फैमिली कोर्ट में उन तस्वीरों को सीलबंद लिफाफे में रखने के लिए एक अर्जी दाखिल की।

कोर्ट ने कहा,

"चूंकि प्रतिवादियों ने बिना शर्त माफी मांगकर और सुधारात्मक उपाय करके अपनी गलती सुधारने की कोशिश की, इसलिए यह कोर्ट 'कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट्स एक्ट, 1971' के तहत प्रतिवादियों के खिलाफ कोई कार्रवाई करने के पक्ष में नहीं है।"

हालांकि, प्रतिवादियों को 'अवमानना' के आरोप से मुक्त करते हुए कोर्ट ने अपनी कड़ी नाराजगी भी जताई।

कोर्ट ने प्रतिवादी-वकीलों से कहा,

"वैवाहिक मुकदमे में क्लाइंट का पक्ष रखने का उत्साह कभी भी दूसरी पार्टी की गरिमा से समझौता करने को सही नहीं ठहरा सकता, खासकर तब जब दूसरी पार्टी एक महिला हो और संबंधित सामग्री इतनी निजी प्रकृति की हो।"

अवमानना ​​याचिका का निपटारा करते हुए कोर्ट ने याचिकाकर्ता महिला को अपनी पहचान छिपाने (मास्किंग और एनोनिमाइज़ेशन) और संबंधित सामग्री की सुरक्षा के लिए फैमिली कोर्ट में जाने की छूट दी।

कोर्ट ने फैमिली कोर्ट से यह भी अनुरोध किया कि वे तस्वीरों को खुले रिकॉर्ड से हटा दें और उन्हें सीलबंद लिफाफे में रखें।

Case title: R v. H

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