दिल्ली हाईकोर्ट ने दिया कस्टडी में हुई मौत के मामले में ₹18 लाख का मुआवज़ा का आदेश, कहा- राज्य की 'देखभाल की विशेष ज़िम्मेदारी'

Update: 2026-07-02 03:55 GMT

दिल्ली हाईकोर्ट ने पुलिस कस्टडी में असामान्य मौत का शिकार हुए 19 साल के युवक के पिता को ₹18.44 लाख का मुआवज़ा देने का आदेश दिया। कोर्ट ने कहा कि अपनी कस्टडी में मौजूद लोगों की जान और सम्मान की रक्षा करना राज्य की "पूरी और न टाली जा सकने वाली ज़िम्मेदारी" है। [2026 LiveLaw (Del) 604]

जस्टिस सचिन दत्ता ने इस बात पर ज़ोर दिया कि जब किसी व्यक्ति की आज़ादी छीन ली जाती है और उसे राज्य की कस्टडी में रखा जाता है, तो अधिकारियों पर उसकी देखभाल की विशेष ज़िम्मेदारी आ जाती है।

कोर्ट ने कहा,

"कस्टडी में मौत की वजह चाहे हिंसा हो, लापरवाही हो, बिना स्पष्ट कारण वाली परिस्थितियां हों या आत्महत्या ही क्यों न हो, ऐसी किसी भी चूक की न्यायिक जांच ज़रूरी है। क्योंकि इससे व्यक्ति के सम्मान और न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता, दोनों पर असर पड़ता है।"

कस्टडी में मौत के मामलों में मुआवज़े से जुड़े पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि कस्टडी में असामान्य मौत—भले ही वह आत्महत्या हो—राज्य की ज़िम्मेदारी से अलग कोई निजी घटना नहीं है, बल्कि यह उन लोगों की तरफ़ से कर्तव्य में चूक को दिखाती है जिन पर सुरक्षा की ज़िम्मेदारी थी।

कोर्ट ने आगे कहा कि राज्य कानूनी योजनाओं का हवाला देकर या सीधे तौर पर दोषी न होने का तर्क देकर अपनी ज़िम्मेदारी से बच नहीं सकता।

कोर्ट ने कहा,

"कस्टडी में मौत का तथ्य ही—क्योंकि यह असामान्य है—ज़िम्मेदारी तय करता है और कोर्ट को मुआवज़े के रूप में राहत देने के लिए मजबूर करता है। इसलिए इस कोर्ट का मानना ​​है कि याचिकाकर्ता के बेटे की कस्टडी में असामान्य मौत के लिए ज़िम्मेदारी बनती है। जीवन और आज़ादी के संरक्षक के तौर पर राज्य अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के लिए मृतक के परिवार को मुआवज़ा देने के लिए बाध्य है। इस तरह याचिकाकर्ता का मुआवज़ा पाने का अधिकार निर्विवाद है। यह तय हो जाने के बाद कि मुआवज़ा दिया जाना है, अगला सवाल इसकी रकम तय करने का है।"

कोर्ट उस याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जो श्याम सुंदर ने अपने बेटे दीपक की मौत के बाद मुआवज़े के लिए दायर की। दीपक की मौत 2017 में दर्ज एक FIR के सिलसिले में करावल नगर पुलिस स्टेशन में कस्टडी के दौरान हुई।

पिता के अनुसार, उनके बेटे को 15 जनवरी 2018 को गिरफ़्तार किया गया। आरोप है कि पुलिस अधिकारियों ने उसके साथ मारपीट की और उसे छोड़ने के बदले पैसे भी मांगे।

अगले दिन, पिता को बताया गया कि उनके बेटे ने कस्टडी में आत्महत्या कर ली और बाद में अस्पताल में उसे 'ब्रॉट डेड' (अस्पताल पहुँचने से पहले ही मृत) घोषित कर दिया गया।

शुरुआत में ही कोर्ट ने कहा कि उसे मौत की सटीक वजह या मामले में किसी गड़बड़ी या कस्टडी में हिंसा के आरोपों पर फ़ैसला करने की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि यह बात निर्विवाद थी कि मृतक की मौत करावल नगर पुलिस स्टेशन में कस्टडी के दौरान अप्राकृतिक कारणों से हुई।

कोर्ट ने आगे कहा कि मुद्दा केवल यह था कि कस्टडी में बेटे की अप्राकृतिक मौत के कारण पिता मुआवज़े का हकदार है या नहीं और मुआवज़े की सही रकम क्या होनी चाहिए; न कि आपराधिक ज़िम्मेदारी तय करना या किसी गड़बड़ी को साबित करना।

कोर्ट ने कहा,

"कस्टडी में मौत सिर्फ़ एक व्यक्ति की त्रासदी नहीं है, बल्कि सिस्टम से जुड़ी चिंता का विषय है, जो कानून के शासन की नींव पर चोट करती है। जब किसी व्यक्ति की आज़ादी छीन ली जाती है और उसे राज्य की कस्टडी में रखा जाता है तो अधिकारियों की देखभाल की ज़िम्मेदारी और भी बढ़ जाती है।"

Title: SHYAM SUNDAR v. STATE (NCT OF DELHI) & ORS

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