राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (NCDRC) की जस्टिस आर.के. अग्रवाल (अध्यक्ष) की पीठ ने कहा कि मुआवजे को कई मदों के तहत नहीं दिया जा सकता। पीठ ने यह टिप्पणी दिल्ली राज्य आयोग के आदेश के खिलाफ दायर अपील पर सुनवाई करते हुए की।

दिल्ली राज्य आयोग ने शिकायत को आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया और आईसीआईसीआई लोम्बार्ड जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड को दावे के खंडन की तारीख से 6% प्रति वर्ष के ब्याज के साथ रु. 75,00,000/- का भुगतान करने का निर्देश दिया।

दिल्ली राज्य आयोग ने आगे निर्देश दिया कि मानसिक पीड़ा के लिए रु. 3,00,000/- और मुकदमेबाजी की लागत के लिए रु. 50,000/- का भुगतान करने के लिए और 9% प्रति वर्ष का ब्याज दावे के खंडन की तारीख से लागू होगा यदि राशि 16.11.2021 तक भुगतान नहीं किया गया।

शिकायतकर्ता/प्रतिवादी स्वर्गीय धर्मबीर सैनी की पत्नी और कानूनी उत्तराधिकारी हैं। अपीलकर्ता सामान्य बीमा कंपनी है। शिकायतकर्ता के पति ने आईसीआईसीआई बैंक से 75,00,000/- रुपये की संपत्ति के बदले होम लोन लिया और लोन को सुरक्षित करने के लिए पति पर बैंक द्वारा बीमा पॉलिसी लेने का दबाव डाला गया। उसे बैंक द्वारा सूचित किया गया कि उसका अपीलकर्ता सहायक कंपनी के साथ गठजोड़ है और वे उसके लिए बीमा पॉलिसी खरीदेंगे।

बीमा पॉलिसी ने आश्वासन दिया कि किसी भी दुर्घटना की स्थिति में अपीलकर्ता बैंक लोन राशि का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी होगा। साथ ही अपीलकर्ता या बैंक द्वारा पति को बीमा पॉलिसी से संबंधित कोई दस्तावेज नहीं दिया गया और बीमाधारक उक्त पॉलिसी के नियमों और शर्तों से अनभिज्ञ है।

2015 में पॉलिसी होल्डर को अस्पताल में भर्ती कराया गया और MODS के साथ सेप्टिक शॉक के कारण उसकी मृत्यु हो गई। शिकायतकर्ता ने दावे के संवितरण के लिए अपीलकर्ता को सभी आवश्यक दस्तावेज भेजे लेकिन यह इस आधार पर खारिज कर दिया गया कि दावा उक्त पॉलिसी के नियमों और शर्तों के अंतर्गत नहीं आता। शिकायतकर्ता ने इसके बारे में बैंक को सूचित किया लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। इससे व्यथित होकर शिकायतकर्ता ने दिल्ली राज्य आयोग का दरवाजा खटखटाया।

अपीलकर्ता बीमा कंपनी ने प्रस्तुत किया कि शिकायत बिना किसी कार्रवाई के दायर की गई और प्रस्ताव फॉर्म में बीमा होल्डर द्वारा मधुमेह और तपेदिक के महत्वपूर्ण पिछले मेडिकल हिस्ट्री का खुलासा नहीं किया गया। उसने आगे कहा कि नियम और शर्तों वाली बुकलेट के साथ बीमा पॉलिसी शिकायतकर्ता/प्रतिवादी के पति को दिनांक 16.10.2013 के पत्र द्वारा विधिवत रूप से दी गई थी।

अपीलकर्ता की ओर से कोई कमी नहीं है, क्योंकि दावा संबंधित पॉलिसी के तहत कवर नहीं किया गया। दिल्ली राज्य आयोग ने बैंक को पक्षकारों की श्रेणी से हटा दिया, क्योंकि शिकायतकर्ता ने बैंक को पूरी लोन राशि का भुगतान कर दिया और कहा कि बैंक के खिलाफ कार्रवाई का कोई कारण नहीं है।

राष्ट्रीय आयोग ने देखा कि एमओडीएस (मल्टीपल ऑर्गन डिसफंक्शन सिंड्रोम) नीति द्वारा कवर नहीं किया गया। हालांकि मेडिकल लिटरेचर के अनुसार यह जीवन के लिए खतरनाक स्थिति है। यह कई कारणों से हो सकता है, जिनमें प्रमुख आघात, जलन, अग्नाशयशोथ, एस्पिरेशन सिंड्रोम, एक्स्ट्राकोर्पोरियल सर्कुलेशन, मल्टीपल ब्लड ट्रांसफ्यूजन, इस्केमिया - रिपरफ्यूजन चोट, ऑटोइम्यून बीमारी, गर्मी से प्रेरित बीमारी, एक्लम्पसिया, विषाक्तता/विषाक्तता आदि शामिल हैं।

इसलिए भले ही एमओडीएस पॉलिसी के तहत कवर नहीं है, फिर भी इसका मतलब यह नहीं कि यह घातक नहीं है या पॉलिसी में उल्लिखित शर्तों के कारण ही लोग मर सकते हैं।

पीठ ने कहा कि अपीलकर्ता यह तर्क नहीं दे सकता कि एमओडी पॉलिसी के तहत कवर नहीं किया गया।

आयोग ने आगे पाया कि कथित पहले से मौजूद बीमारियों (मधुमेह और तपेदिक) और मृत्यु के कारण के बीच कोई निकटता नहीं है। इसके अलावा, दिल्ली राज्य आयोग के आदेश में इस बात पर भी प्रकाश डाला गया कि बीमाधारक को पॉलिसी के नियमों और शर्तों की आपूर्ति नहीं की गई और वह उनसे अनजान था। इसलिए अपीलकर्ता का आगे यह निवेदन कि वर्तमान मामले में बैंक की बहियों में बकाया मूल राशि में उसकी देनदारी स्वीकार नहीं की जा सकती।

उपरोक्त चर्चा के आलोक में पीठ ने पाया कि दिल्ली राज्य आयोग का आदेश जिसमें अपीलकर्ता को बीमाधारक को ब्याज सहित 75,00,000/- रुपये का भुगतान करने का निर्देश दिया गया, पूरी तरह से उचित है।

हालाँकि पीठ ने आगे कहा कि दिल्ली राज्य आयोग का मुआवजे के रूप में 3,00,000/- रुपये का भुगतान करने का निर्देश वारंट नहीं है, क्योंकि ब्याज के रूप में मुआवजा दिल्ली राज्य आयोग द्वारा पहले ही प्रदान किया जा चुका है। कई मदों के तहत मुआवजा नहीं दिया जा सकता है और डीएलएफ होम्स पंचकुला प्राइवेट लिमिटेड बनाम डीएस ढांडा और डीएलएफ होम्स पंचकुला प्रा. लिमिटेड और अन्य बनाम सुदेश गोयल और अन्य के मामले में माननीय सुप्रीम कोर्ट ने भी यही दृष्टिकोण अपनाया है।

केस टाइटल: आईसीआईसीआई लोम्बार्ड जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनामा नीमा सैनी

प्रथम अपील नंबर 746/2021

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