ऐच्छि‌क यौन संबंध के ज‌रिए यौन स्वायत्तता का प्रयोग कर रही महिला के बारे में यह नहीं माना जा सकता है कि उसने प्रजनन अधिकारों के उल्लंघन के लिए सहमति दी हैः ‌दिल्‍ली कोर्ट

Update: 2021-10-06 09:36 GMT

दिल्ली की एक अदालत ने कहा है कि एक महिला अपने सा‌‌‌थी के साथ ऐच्छ‌िक यौन संबंध के ज‌रिए अपनी यौन स्वायत्तता का प्रयोग करती है, यह नहीं माना जा सकता है कि उसने प्रजनन अधिकारों के उल्लंघन के लिए अपनी सहमति दी है।

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश विशाल गोगने ने कहा कि एक महिला का यौन विकल्पों का प्रयोग करना उसके साथी को उसका यौन शोषण करने का अधिकार नहीं देता और जब वह अपने साथी के साथ यौन संबंध में प्रवेश करती है तो वह प्रजनन अधिकारों सहित अपने अधिकारों का त्याग नहीं करती है।

कोर्ट ने उक्त टिप्पण‌ियों के साथ एक महिला के साथ कई बार बलात्कार करने और तीन बार पर गर्भपात कराने के आरोपी व्यक्ति को जमानत देने से इनकार कर दिया। महिला चौथी बार आठ महीने की गर्भवती थी और उसने आरोप लगाया कि वह उसके साथ मारपीट करता है।

कोर्ट ने कहा, "जब यौन संबंध सुसंगत और लंबी अवधि के हों तो सहमति आधा‌रित संबंधों में पार्टियां एक समान बिंदु पर हो सकती हैं, कई गर्भधारण और गर्भपात के कारण प्रजनन स्वायत्तता का उल्लंघन करने का कार्य सहमति के तत्व को दूर करता है...।"

"अपने सा‌‌‌थी के साथ सहमतिपूर्ण संबंधों के जर‌िए शारीरिक/यौन स्वायत्तता का प्रयोग करती महिला के संबंध में अतिरिक्त रूप से यह नहीं माना जा सकता है कि उसने प्रजनन अधिकारों के उल्लंघन के लिए अपनी सहमति दी है। यदि आरोपी गर्भपात कराने के आरोप के अंत या संबद्ध आरोप के साथ यौन संबंध जारी रखता है तो यौन क्रिया के लिए सहमति स्वयं ही समाप्त हो जाती है।"

कोर्ट ने कहा कि उसने एक पीड़ित शिकायतकर्ता के नजरिए से आरोपों को समझने का प्रयास किया है, जो न केवल बलात्कार का आरोप लगा रही है, बल्कि अकेली मां के रूप में अपनी पहचान बनाने के लिए बाधाओं से जूझ रही है।

इसलिए यह देखा गया कि ऐसा प्रतीत होता है कि आरोपी ने महिला का यौन शोषण और प्रजनन अधिकारों का उल्लंघन, दोनों किया है।

कोर्ट ने कहा, "एक महिला द्वारा यौन विकल्प का प्रयोग करने से साथी को उसका यौन शोषण का अधिकार नहीं मिलता। एक महिला अपने साथी के साथ यौन संबंध में प्रवेश करती है तो वह अपने अन्य अधिकारों का त्याग नहीं करती है, जिसमें प्रजनन का अधिकार भी शामिल है।"

कोर्ट ने जमानत याचिका रद्द करते हुए कहा, "शिकायतकर्ता की स्पष्ट पस्त दुर्दशा के मद्देनजर, बलात्कार के झूठे आरोपों के आधार के रूप में, सहमति से संबंध के कड़वे होने के संबंध में (आरोपी की) याचिका खारिज की जानी चाहिए। हालांकि यह ट्रायल का विषय हो सकता है और यह बहस का विषय है कि क्या शिकायतकर्ता आरोपी के साथ विवाह के संबंध में किसी गलत धारणा में थी? इसमें प्रथम दृष्टया

संदेह नहीं है कि उसने निश्चित रूप से कई गर्भपात और भविष्य में अपने प्रजनन अधिकारों के स्थायी नुकसान के लिए उसे यौन संबंध के लिए अपनी सहमति नहीं दी थी।"

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