पति की गला घोंटकर हत्या करने का मामला: यूपी कोर्ट ने महिला और उसके प्रेमी को सुनाई मौत की सजा
उत्तर प्रदेश के मेरठ में सेशन कोर्ट ने पिछले हफ्ते 28 वर्षीय महिला और उसके 20 वर्षीय प्रेमी को मौत की सजा सुनाई। उन्होंने महिला के 31 वर्षीय पति की हत्या की थी और उसकी मौत को सांप के काटने से हुई मौत दिखाने के लिए शव के पास एक जिंदा सांप रख दिया था।
एडिशनल सेशंस जज जयवीर सिंह नागर ने माना कि यह मामला 'दुर्लभतम से दुर्लभ' (Rarest of Rare) श्रेणी में आता है, क्योंकि हत्या पहले से योजना बनाकर की गई। जिस समय हत्या हुई, पीड़ित सो रहा था और असहाय था। इसके अलावा, आरोपियों ने उसकी मौत को सांप के काटने से हुई मौत बताकर अपराध को छिपाने की कोशिश की थी।
मुख्य रूप से हिंदी में लिखे गए अपने 127 पन्नों के फैसले में अदालत ने 'आत्रेय संहिता' के इस श्लोक का भी उल्लेख किया:
"दुष्टस्य दंडः स्वजनस्य पुजा न्यायेन कोशस्य हि वर्धनं च। अपक्षपातः निजराष्ट्ररक्षा पञ्चैव धर्माः कथिता नृपाणाम्" (दुष्टों को दंड देना, सज्जनों का सम्मान करना, न्यायपूर्ण शासन के माध्यम से राज्य की गरिमा बढ़ाना, न्याय मांगने वालों के साथ बिना किसी भेदभाव के निष्पक्ष व्यवहार करना और अपने राष्ट्र की रक्षा करना—ये न्याय प्रणाली के पांच मुख्य कर्तव्य माने गए।)
अदालत ने दोनों दोषियों को भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 238 के तहत 7 साल के कठोर कारावास की सजा भी सुनाई। हालांकि, BNSS की धारा 407 के अनुसार, मौत की सजा को लागू करने के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट की पुष्टि (Confirmation) आवश्यक है।
मामले का संक्षिप्त विवरण
अभियोजन पक्ष के अनुसार, आरोपी रविता का आरोपी अमरदीप के साथ विवाहेत्तर संबंध था। कथित तौर पर इसी वजह से रविता और उसके पति अमित (मृतक) के बीच विवाद हुआ। 12 अप्रैल 2025 को दंपति के बीच झगड़ा भी हुआ।
अगली सुबह, अमित अपने घर में एक खाट पर मृत पाया गया और उसके शव के पास एक जिंदा सांप था। अमित के भाई ने उसके चेहरे और गर्दन पर चोट के निशान भी देखे। परिवार अमित को मेरठ के एक अस्पताल ले गया, जहां डॉक्टरों ने बताया कि उसकी मौत सांप के काटने से नहीं हुई। पोस्टमार्टम रिपोर्ट से भी यह पुष्टि हुई कि उसकी मौत गला घोंटे जाने के कारण हुई। मेडिकल जांच में 'हायोइड बोन' (Hyoid Bone) और 'थायरॉयड कार्टिलेज' (Thyroid Cartilage) में फ्रैक्चर पाए गए।
जांच के दौरान यह सामने आया कि आरोपी [रविता और अमरदीप] कथित तौर पर एक-दूसरे के साथ रिश्ते में थे। अभियोजन पक्ष ने यह सबूत भी पेश किया कि अमरदीप ने एक सपेरे से 1,000 रुपये में सांप खरीदा था।
सपेरे ने गवाही दी कि अमरदीप ने एक धार्मिक आयोजन के लिए 'घोड़ा पछाड़' (Ghoda Pachhad) सांप मांगा था और इसके लिए उसे 1,000 रुपये दिए।
अदालत की टिप्पणियां
अपने फैसले में अदालत ने परिस्थितिजन्य साक्ष्यों (Circumstantial Evidence) पर भरोसा किया। इसमें आरोपियों के बीच के रिश्ते से जुड़ी गवाही और उनके कॉल-डिटेल रिकॉर्ड शामिल थे, जिनसे पता चलता है कि उनके बीच अक्सर और लंबी फोन पर बातचीत होती थी।
अदालत ने उन लोगों की गवाही पर भी गौर किया, जिन्हें अमित के शव के पास से सांप हटाने के लिए बुलाया गया। अभियोजन पक्ष ने इस सबूत पर भी जोर दिया कि अमित को इस रिश्ते के बारे में पता चल गया था और उसने इसे लेकर रविता से झगड़ा भी किया।
अदालत ने माना कि आरोपियों के बीच का रिश्ता ही हत्या का मकसद (Motive) था, और यह बात बिना किसी उचित संदेह के साबित हो गई।
मेडिकल रिपोर्ट और अन्य परिस्थितियों के साथ इन सबूतों का आकलन करने के बाद अदालत ने अभियोजन पक्ष के इस तर्क को स्वीकार कर लिया कि अमित का गला घोंटा गया और उसकी मौत को सांप के काटने का मामला दिखाने के लिए शव के पास सांप रख दिया गया।
पूरी सुनवाई के बाद अदालत ने दोनों आरोपियों को दोषी ठहराया। अदालत ने टिप्पणी की कि इस अपराध की गंभीरता न केवल एक सोते हुए व्यक्ति की हत्या करने में है, बल्कि मौत के असली कारण को छिपाने की कोशिश करने में भी है।
अदालत ने अपने फैसले में कहा,
"इस अपराध की गंभीरता सिर्फ इस बात में नहीं है कि एक सोते हुए व्यक्ति की हत्या की गई, बल्कि इस बात में भी है कि मृतक के पास सांप रखकर मौत के असली कारण को छिपाने की कोशिश की गई, ताकि ऐसा लगे कि उसकी मौत सांप के काटने से हुई।"
यह विचार करते हुए कि क्या इस मामले में मौत की सजा दी जानी चाहिए, अदालत ने कहा कि आरोपी ने कथित तौर पर हत्या की योजना इस तरह से बनाई थी कि पीड़ित शोर न मचा सके और आस-पास सो रहे लोगों को उसकी चीखें सुनाई न दें।
अदालत ने टिप्पणी की,
"आरोपियों ने तब उस व्यक्ति का गला घोंट दिया और उसका मुंह इस तरह दबा दिया कि वह चीख भी नहीं सका। यह घटना रात के समय हुई, जब वह सो रहा था—एक ऐसा समय जब इंसान अपने ही घर में सबसे सुरक्षित महसूस करता है। हत्या का यह कृत्य अपने आप में बेहद क्रूर और मनमाने ढंग से किया गया लगता है।"
अदालत ने आगे कहा कि यह हत्या किसी अचानक आए गुस्से या पल भर के विवाद का नतीजा नहीं थी, बल्कि इसे एक सोची-समझी योजना के तहत अंजाम दिया गया।
अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि पीड़ित (मृतक) चारपाई पर लेटा हुआ था और उसे यह सोचने की कोई वजह नहीं थी कि उसकी अपनी पत्नी—जिस पर कोई भी इंसान सबसे ज्यादा भरोसा करता है—वही उसकी हत्या कर देगी।
अदालत ने कहा कि आरोपियों का यह कृत्य रिश्तों और सामाजिक मानदंडों में रखे गए भरोसे को तोड़ता है।
आगे कहा गया:
"जब कोई हत्या केवल अपनी यौन इच्छा को संतुष्ट करने के लिए की जाती है तो यह घोर पतन और नीचता को दर्शाती है। यह हत्या पूरी तरह से ठंडे दिमाग से और बिना किसी उकसावे के की गई... आरोपियों ने अपनी योजना के तहत जानबूझकर चारपाई पर एक सांप छोड़ दिया, जो उनकी चालाकी और साजिश रचने की प्रवृत्ति को दिखाता है। इस तरह इस मामले में ऊपर बताई गई सभी बातें मौजूद हैं। ऐसा कृत्य समाज की अंतरात्मा को झकझोर देता है।"
आरोपियों ने यह तर्क दिया कि यह मामला 'दुर्लभतम से दुर्लभ' (Rarest of Rare) श्रेणी में नहीं आता है, क्योंकि मृतक की मौत गला घोंटने से हुई थी और उसके शरीर को न तो क्षत-विक्षत किया गया और न ही जलाया गया।
अदालत ने सभी परिस्थितियों, अपराध करने के तरीके, दोषियों की भूमिका और अपराध के बाद उनके व्यवहार पर विचार करने के बाद इस तर्क को खारिज कर दिया। अदालत ने उस क्रूरता का भी जिक्र किया जिसके साथ यह हत्या की गई।
अदालत ने टिप्पणी की:
"क्रूरता का मतलब केवल किसी के शरीर को क्षत-विक्षत करना ही नहीं है, बल्कि इसमें ऐसी क्रूरता भी शामिल है, जो किसी व्यक्ति के भरोसे को तोड़ देती है। साथ ही समाज की अंतरात्मा को भी आहत करती है।"
अदालत ने माना कि हत्या को सांप के काटने से हुई मौत दिखाने की कोशिश इस मामले का एक अहम पहलू है। अदालत ने यह भी निष्कर्ष निकाला कि दोषियों के सुधरने और समाज में फिर से घुल-मिल जाने की कोई ठोस संभावना नहीं है। अदालत ने आरोपी के अपराध करने के "सिनेमाई अंदाज" का जिक्र करते हुए कहा कि "यह अपराध 'दुर्लभतम से दुर्लभ' (Rarest of Rare) श्रेणी में आता है, और इसमें किसी अन्य संभावना की कोई गुंजाइश नहीं है।"
अदालत ने कहा कि अपराध करने का अनोखा तरीका और उसे छिपाने का अनोखा तरीका "इस मामले को 'दुर्लभतम से दुर्लभ' श्रेणी की ओर ले जाता है।"
अदालत ने 'पुरुषोत्तम दशरथ बोराटे बनाम महाराष्ट्र राज्य (2015)' मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया और सजा तय करने से जुड़ा यह अंश उद्धृत किया:
"सजा देने की नीति का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होना चाहिए कि कोई भी अपराध बिना सजा के न रहे, और अपराध के शिकार व्यक्ति तथा समाज को यह संतुष्टि मिले कि उन्हें न्याय मिला है।"
अपराध की गंभीरता बढ़ाने वाले और कम करने वाले सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद, अदालत इस नतीजे पर पहुंची कि केवल आजीवन कारावास की सजा पर्याप्त नहीं होगी।