'यह उचित तरीका नहीं है, जिसमें किसी प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय को कार्य करना चाहिए' : मद्रास हाईकोर्ट ने अन्ना यूनिवर्सिटी को नियमित नियुक्ति द्वारा शिक्षण पदों को भरने का आदेश दिया

Update: 2020-11-11 05:00 GMT

Madras High Court

मद्रास हाईकोर्ट ने सोमवार को अन्ना यूनिवर्सिटी को यूजीसी और एआईसीटीई के दिशानिर्देशों का ठीक से पालन न करने और लगभग दस वर्षों से अस्थायी शिक्षण कर्मचारियों के बल पर कार्य करने के मामले में फटकार लगाई है।

यूनिवर्सिटी द्वारा बनाए गए अपर्याप्त संकाय छात्र अनुपात को ध्यान में रखते हुए न्यायमूर्ति एन आनंद वेंकटेश की खंडपीठ ने कहा कि,

''यह आश्चर्यजनक है कि जो छात्र इस यूनिवर्सिटी से पढ़कर बाहर निकल रहे हैं, वे पर्याप्त शिक्षण संकाय की अनुपलब्धता के बावजूद अच्छी तरह से आगे बढ़ रहे हैं। ऐसे में एक बात साफ है कि या तो छात्र बेहद तेजबुद्धि के हैं या उपलब्ध संकाय उत्कृष्ट शिक्षण कौशल प्रदान करके एक असाधारण कार्य कर रहा हैं। कुछ भी कारण हो सकता है, तथ्य यह है कि यूनिवर्सिटी को नियमित नियुक्तियों के माध्यम से रिक्त पदों को भरने के लिए युद्धस्तर पर तत्काल कदम उठाने होंगे।''

पीठ ने यूनिवर्सिटी को याद दिलाया कि अनुबंध के आधार पर नियुक्ति कॉलेज/ यूनिवर्सिटी में कुल संकाय पदों की संख्या का 10 प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए। इसके अलावा, ऐसे अनुबंध शिक्षकों को भुगतान किया गया वेतन नियमित रूप से नियुक्त सहायक प्रोफेसर के मासिक सकल वेतन से कम नहीं होना चाहिए।

यूनिवर्सिटी द्वारा लगभग 80 'टीचिंग फेलो' के अनुबंध खत्म करने के खिलाफ दायर रिट याचिकाओं के एक बैच का निपटान करते हुए पीठ ने यह टिप्पणी की है। इन याचिकाओं में मांग की गई थी कि उनकी नियुक्ति की तारीख से सहायक प्रोफेसर के पद पर उनकी सेवाओं को नियमित किया जाए।

याचिकाकर्ताओं ने प्रस्तुत किया था कि उन्हें एक प्रतियोगी प्रक्रिया के माध्यम से नियुक्त किया गया था और वह एक विधिवत चयन समिति द्वारा बनाई गई उचित चयन प्रक्रिया से गुजरे थे। इसके अलावा, उन्होंने छह साल से लेकर दस साल तक की अपनी सेवा दी है, लेकिन अब यूनिवर्सिटी ने उनको ''अनौपचारिक तरीके से हटा'' दिया है।

मामले के तथ्यों पर विचार करने के बाद, न्यायालय का मत था कि याचिकाकर्ताओं द्वारा पेश परिणामों से पता चलता है कि उन्होंने छात्रों के विकास में योगदान दिया था और यूनिवर्सिटी व इसके कॉलेजों को भी आगे बढ़ाया है। इसके अलावा उन्होंने यूजीसी और एआईसीटीई विनियमों के तहत अपनी पिछली सेवाओं के प्रति अधिकार प्राप्त कर लिया है।

न्यायालय ने प्रत्येक याचिकाकर्ता की योग्यता को ध्यान से देखा और पाया कि वे सहायक प्रोफेसर के रूप में सीधी भर्ती के लिए न्यूनतम योग्यता को पूरा करते हैं। पीठ ने कहा कि,

''उनके द्वारा किए गए कार्यो की प्रकृति और उनके द्वारा किए गए विभिन्न अन्य कार्य जैसे संबद्धता के लिए संस्थानों को प्रमाणित करने के लिए प्रशिक्षकों के रूप में नामित होना, शोध पत्र प्रकाशित करना आदि से यह स्पष्ट रूप से पता चलता है कि वे नियमित रूप से नियुक्त सहायक प्रोफेसर की तरह कार्य कर रहे थे।''

इसलिए, अन्ना यूनिवर्सिटी को निर्देश दिया गया है कि नियमित भर्ती पूरी होने और रिक्त पदों को भरने तक सभी याचिकाकर्ताओं को 1 दिसंबर, 2020 से 'अस्थायी सहायक प्रोफेसर' के रूप में नियुक्त किया जाए।

न्यायालय ने हालांकि सहायक प्रोफेसरों के रूप में उनकी सेवाओं को नियमित करने से इनकार कर दिया क्योंकि यूनिवर्सिटी ने याचिकाकर्ताओं का चयन करते हुए और अनुबंध के आधार पर उन्हें रखते समय व्यापक विज्ञापन नहीं दिया था।

न्यायालय ने कहा कि वर्तमान मामले में आवेदन मांगते समय विज्ञापन को केवल अन्ना यूनिवर्सिटी की आधिकारिक साइट पर अधिसूचित किया गया था,जो एक आंतरिक संचार की प्रकृति का था। पीठ ने कहा कि,

''कोई भी सार्वजनिक रोजगार ,जो रोजगार एक्सचेंज और समाचार पत्रों के माध्यम से व्यापक प्रचार दिए बिना ही पूरा किया जाता है, वह अवैधता से ग्रस्त होगा ... इसलिए, वर्तमान मामले में यह नहीं कहा जा सकता है कि याचिकाकर्ताओं को यह अनुबंधित रोजगार इतना व्यापक प्रचार देने के बाद दिया गया था।''

यह भी कहा कि,

''जब सहायक प्रोफेसर के रूप में सेवा के नियमितीकरण का सवाल आता है, जैसा कि याचिकाकर्ताओं द्वारा दावा किया गया है, तो यह अदालत इस राहत को देने के लिए इच्छुक नहीं है। जहां अस्थायी या तदर्थ नियुक्ति लंबे समय तक जारी रहती है, वहां पर अदालत यह मानती है कि एक नियमित पद की जरूरत है और इसलिए नियमितीकरण पर विचार करती है। लेकिन, ऐसे मामलों में कोई थम रूल नहीं है।''

कोर्ट ने अन्ना यूनिवर्सिटी को निर्देश दिया है कि वह याचिकाकर्ताओं को नियमित सहायक प्राध्यापकों के समान वेतन प्रदान करे। यह भी माना कि,

''यूजीसी विनियम और साथ ही एआईसीटीई विनियम, दोनों यह बहुत अच्छे से स्पष्ट करते हैं कि तदर्थ या अस्थायी सेवा के मामलों में भी, ऐसे अनुबंध पर रखे गए शिक्षकों को भुगतान किया गया वेतन नियमित रूप से नियुक्त सहायक प्रोफेसर के मासिक सकल वेतन से कम नहीं होना चाहिए। अन्ना यूनिवर्सिटी ने इन विनियमों पर ठीक से पालन नहीं किया और याचिकाकर्ताओं को समेकित वेतन देना जारी रखा, जो कि नियमित रूप से नियुक्त सहायक प्रोफेसर को दिए जाने वाले वास्तविक वेतन के आस-पास भी नहीं था।

यह फिर से दोहराया गया है कि याचिकाकर्ताओं को भले ही टीचिंग फेलो कहा जाता था, वास्तव में सभी योग्यता के साथ वह एक सहायक प्रोफेसर के कर्तव्यों का पालन कर रहे थे। इसलिए, उन्हें नियमित रूप से नियुक्त सहायक प्रोफेसर के मासिक सकल वेतन के साथ सममूल्य वेतन का भुगतान किया जाना चाहिए था।''

मामले में पीएम मलाठी बनाम तमिलनाडु राज्य, (2012) 3 एमएलजे 669 मामले में दिए गए फैसले का हवाला भी दिया गया।

केस का शीर्षक- टीआर कन्नन व अन्य बनाम अन्ना विश्वविद्यालय व अन्य।

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