दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि एक पुनरीक्षण अदालत सीआरपीसी की धारा 125 के तहत पारित अंतरिम भरणपोषण आदेश पर रोक लगाने पर विचार करते हुए, मामले की परिस्थितियों के तथ्यों की अनदेखी करके पूरी भरणपोषण राशि जमा करने का सामान्य निर्देश नहीं दे सकती है।

जस्टिस गिरीश कठपालिया की अवकाश पीठ ने कहा,

"सीआरपीसी की धारा 125 के तहत कार्यवाही में पारित एक अंतरिम भरणपोषण आदेश की पुनरीक्षण जांच करते समय, पुनरीक्षण न्यायालय एक अन्य कारण से, आक्षेपित अंतरिम भरणपोषण आदेश के संचालन पर रोक लगाने के लिए मामले की समग्र परिस्थितियों की अनदेखी करते हुए पूर्व-शर्त के रूप में इस तरह के सामान्य राइडर नहीं लगा सकता, भरणपोषण की पूरी राशि जमा की जाए।"

अदालत एक पति की उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें निचली अदालत के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें अंतरिम भरणपोषण आदेश के क्रियान्वयन पर रोक लगाने के उसके अनुरोध को खारिज कर दिया गया था।

ट्रायल कोर्ट ने राजीव प्रींजा बनाम सारिका में हाईकोर्ट द्वारा जारी निर्देशों पर पूरी तरह से भरोसा करते हुए ऐसा किया। उक्त मामले में, अदालत ने निर्देश दिया था कि जब पत्नी के पक्ष में एक मजिस्ट्रेट द्वारा पारित अंतरिम भरणपोषण के आदेश के खिलाफ सत्र न्यायालय में पति द्वारा पुनरीक्षण दायर किया जाता है, एमएम द्वारा संशोधन याचिका पर विचार नहीं किया जाएगा "जब तक कि एमएम के आदेश के तहत पुनरीक्षण याचिका दायर करने की तारीख तक अंतरिम भरणपोषण की पूरी राशि पहले विद्वान एएसजे की अदालत में जमा नहीं की जाती है"।

जस्टिस कठपालिया ने कहा कि बाद में बृजेश कुमार गुप्ता बनाम शिखा गुप्ता मामले में एक एकल न्यायाधीश ने कहा कि इस बात पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता है कि ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई पूरी भरणपोषण राशि वैधानिक अपील की सुनवाई से पहले जमा की जानी चाहिए।

यह देखते हुए कि दो समन्वय पीठों के परस्पर विरोधी विचारों के मुद्दे को बाद में सबीना सहदेव बनाम विदुर सहदेव में एक खंडपीठ द्वारा सुलझाया गया था, अदालत ने कहा कि कानूनी स्थिति जो उभरती है वह यह है कि राजीव प्रींजा के मामले में मजिस्ट्रेट और सत्र न्यायालय को जारी किए गए सामान्य निर्देश कानून में टिकाऊ नहीं हैं।

विवादित आदेश को रद्द करते हुए, जस्टिस कठपालिया ने कहा,

"चूंकि आक्षेपित आदेश में विद्वान अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने अंतरिम भरणपोषण आदेश के संचालन पर रोक लगाने से इनकार कर दिया, केवल राजीव प्रींजा (सुप्रा) में जारी निर्देशों पर भरोसा करते हुए, जो निर्देश बाद में कानून की नजर में टिकाऊ नहीं पाए गए, इन कार्यवाहियों में विद्वान अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश का आक्षेपित आदेश रद्द किए जाने योग्य है।"

यह देखते हुए कि सीआरपीसी की धारा 397 सत्र न्यायालय और हाईकोर्ट को स्वतः संज्ञान की शक्तियां प्रदान करती है, अदालत ने कहा कि न्याय के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए ऐसी शक्तियां का प्रयोग हमेशा संबद्ध "कर्तव्य" के साथ किया जाता है।

याचिका को स्वीकार करते हुए, अदालत ने मामले को फिर से तय करने के लिए अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश के पास वापस भेज दिया।

केस टाइटल: आरएस बनाम एमबी

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