इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में फिरौती के लिए अपहरण (आईपीसी की धारा 364ए) के मामले में 11 साल के लड़के का अपहरण करने वाले दो लोगों की सजा को गुप्त रूप से और गलत तरीके से एक व्यक्ति को बंधक बनाने के इरादे से अपहरण (धारा 365 आईपीसी) में बदल दिया है। इस आधार पर कि बच्चे के पिता को फिरौती के लिए भेजा गया कथित पत्र अभियोजन पक्ष द्वारा साबित नहीं हुआ।

रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों को ध्यान में रखते हुए, चीफ जस्टिस प्रीतिंकर दिवाकर और जस्टिस नलिन कुमार श्रीवास्तव की पीठ ने कहा कि शिकायतकर्ता के बेटे के अपहरण के लिए अपीलकर्ताओं/दोषियों का इरादा उसे गुप्त रूप से और गलत तरीके से कैद में रखना था।

कोर्ट ने कहा,

"इस प्रकार यह स्पष्ट है कि फिरौती की सामग्री साबित नहीं हुई है और सबूत आईपीसी की धारा 365 की सामग्री को स्थापित करते हैं, और इसलिए, सजा को आईपीसी की धारा 364ए से आईपीसी की धारा 365 में बदला जा सकता है।" .

मामला

अभियोजन पक्ष का कहना है कि छह-सात अज्ञात बदमाश 21-22 नवंबर 1997 की रात शिकायतकर्ता के घर आए और उसके 11 वर्षीय बेटे को उठा ले गए।

यह देख शिकायतकर्ता और उसकी पत्नी ने शोर मचाया, जिससे पड़ोसी वहां जमा हो गए और जब सभी ने लड़के को बदमाशों से छुड़ाने की कोशिश की तो उन्होंने बंदूक से फायर कर दिया और लड़के को लेकर भाग गए।

उस स्थान से भागते समय, अभियुक्त-अवधेश (जिसकी ट्रायल के दौरान मृत्यु हो गई) द्वारा चलाई गई गोली से एक पीडब्लू 1 जबर सिंह घायल हो गया।

इसके बाद मामले में 6-7 अज्ञात बदमाशों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी। महत्वपूर्ण रूप से, मुकदमे के दौरान शिकायतकर्ता ने स्वीकार किया कि उसने सभी बदमाशों की पहचान कर ली है, हालांकि, उसने जांच अधिकारी को उनके नामों का खुलासा नहीं किया क्योंकि उसे डर था कि उनके बेटे को उनके द्वारा मार दिया जाएगा।

जांच के दौरान शिकायतकर्ता ने अपहृत लड़के के संबंध में 70,000 रुपये की फिरौती मांगने के संबंध में एक पत्र सौंपा।

बाद में पुलिस को अपहृत लड़के के ठिकाने के बारे में एक सूचना मिली। पुलिस उस स्थान पर पहुंची जहां लड़के को रखा गया था और दोनों पक्षों (पुलिस और आरोपी व्यक्तियों) की ओर से फायरिंग के बाद लड़के को बरामद कर लिया गया।

बाद में, जांच के बाद आरोपी व्यक्तियों के नाम सामने आए, उनके खिलाफ आईपीसी की विभिन्न धाराओं के तहत आरोप पत्र दायर किया गया था।

ट्रायल के बाद, विशेष न्यायाधीश (डीएए)/अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, एटा ने 2008 में अपीलकर्ताओं को धारा 364ए, 307 सहप‌ठित 149 के तहत दोषी ठहराया और आजीवन कारावास की सजा सुनाई।

दोषसिद्धि और सजा को चुनौती देते हुए, अभियुक्तों ने यह कहते हुए हाईकोर्ट का रुख किया कि उनका नाम एफआईआर में नहीं है क्योंकि यह अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ दर्ज किया गया था।

यह भी तर्क दिया गया कि शिकायतकर्ता के बेटे का अपहरण किसी फिरौती के लिए नहीं किया गया था और इसलिए, अभियोजन पक्ष का मामला आईपीसी की धारा 364ए के दायरे में नहीं आता है।

महत्वपूर्ण रूप से, यह भी तर्क दिया गया था कि चूंकि तथाकथित पुलिस फायरिंग का मामला ट्रायल कोर्ट द्वारा झूठा पाया गया था, और इसलिए, वर्तमान अपीलकर्ताओं के कब्जे से अपहृत लड़के की कथित बरामदगी को भी झूठी कहानी माना जा सकता है।

निष्‍कर्ष

शुरुआत में, अदालत ने नोट किया कि पीडब्लू-1, पीडब्लू-2 (शिकायतकर्ता) के बयानों में अभियुक्त-अवधेश के नाम को घायल गवाह पर गोली चलाने वाले के रूप में दिखाया गया था, यह एक ऐसा तथ्य था, जिसकी चिकित्सा साक्ष्य द्वारा पुष्टि की गई थी।

अदालत ने यह भी नोट किया कि पीडब्लू-3 (अपहृत बच्चे) के बयान में सभी पांच अभियुक्तों- पुसे, श्रीपाल, इंद्रपाल, अवधेश, कल्लू और महात्मा- के नाम सामने आए थे।

इसे देखते हुए, अदालत ने आईपीसी की धारा 307/149 के तहत अभियुक्त को दोषी ठहराने को न्यायोचित पाया।

कोर्ट ने कहा,

"यह उल्लेखनीय है कि यद्यपि अभियुक्त अवधेश, जिसे घायल जबर सिंह पर गोली चलाने वाला मुख्य हमलावर कहा जाता है, की मृत्यु हो गई है, लेकिन चूंकि अपराध गैर-कानूनी जमावड़े के सभी सदस्यों के सामान्य उद्देश्य के अभियोजन में किया गया था, सदस्य होने के नाते गैरकानूनी जमावड़े के मामले में, सभी अपीलकर्ता उपरोक्त अपराध के लिए संयुक्त रूप से दोषी थे और इस आधार पर उनकी दोषसिद्धि कानूनी और उचित है।"

अब, आईपीसी की धारा 364ए के तहत दोषसिद्धि के सवाल पर, अदालत ने कहा कि फिरौती का मूल पत्र अदालत के समक्ष पेश नहीं किया गया था; इसके बजाय, ट्रायल कोर्ट ने ऐसे पत्र की फोटोकॉपी पर भरोसा किया था, जो कि साक्ष्य अधिनियम के अनुसार अस्वीकार्य था।

इस संबंध में कोर्ट ने एविडेंस एक्ट की धारा 64 का हवाला दिया जिसमें कहा गया है कि अगर किसी दस्तावेज की मूल प्रति उपलब्ध है तो वह प्राथमिक साक्ष्य है और ऐसे दस्तावेज को ट्रायल के दौरान साबित करना होगा।

न्यायालय ने यह भी कहा कि जब तक अभियोजन पक्ष यह नहीं दिखाता है कि मूल खो गया है, नष्ट हो गया है या गिर गया है, तब तक उनके लिए द्वितीयक साक्ष्य के रूप में दस्तावेज़ की एक फोटोकॉपी पेश करने की अनुमति नहीं थी।

इस मामले में कहीं भी अभियोजन पक्ष द्वारा यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि मूल फिरौती अंतर्देशीय पत्र न्यायालय के समक्ष क्यों पेश नहीं किया जा सका...

अभियोजन पक्ष द्वारा कथित फिरौती पत्र की फोटोकॉपी को न्यायालय के समक्ष मूल प्रस्तुत करने में असमर्थता दिखाए बिना साबित करने के लिए एक गलत प्रक्रिया अपनाई गई थी और ट्रायल कोर्ट ने उक्त की फोटोकॉपी प्रदर्शित करने की अनुमति देते हुए कानून की एक त्रुटि भी की है, बिना यह सुनिश्चित किए फिरौती का पत्र कि मूल के अभाव में, फोटोकॉपी को सबूत के तौर पर अदालत में पेश करने की अनुमति दी जा सकती थी।”

इसलिए, अदालत ने कहा कि चूंकि उक्त फिरौती पत्र (मूल रूप में) कानून द्वारा निर्धारित तरीके से साबित नहीं हुआ था और इस प्रकार, इसकी कोई कानूनी वैधता नहीं थी और इसका कोई उपयोग नहीं था और इसलिए, आईपीसी की धारा 364ए (जो फिरौती की मांग की आवश्यकता है), नहीं बनाया गया था।

अदालत ने कहा, "...रिकॉर्ड पर ऐसा कोई सबूत नहीं था जिससे पता चलता हो कि पीड़ित को किसी भी तरह से उसकी मौत की धमकी दी गई थी या आरोपी व्यक्तियों द्वारा चोट पहुंचाई गई थी या वास्तव में उसे चोट पहुंचाई गई थी ताकि सूचना देने वाले को फिरौती देने के लिए मजबूर किया जा सके।"

इस पृष्ठभूमि में यह देखते हुए कि आरोपी ने लड़के को गन्ने के खेत में रखा, उसके बाद बाजरे के खेत में और फिर कपड़े से आंखें बंद करके कुठिया में रखा, कानों में रुई ठूंस दी और हाथ भी बांध दिए। कोर्ट ने कहा कि साक्ष्य आईपीसी की धारा 365 के तहत अपराध के आवश्यक तत्वों को पूरा करते हैं।

नतीजतन, अदालत ने दोषियों की सजा को आईपीसी की धारा 364ए से बदलकर आईपीसी की धारा 365 कर दिया।

केस टाइटलः इंद्र पाल एवं अन्य बनाम यूपी राज्य एक जुड़ी हुई अपील के साथ

केस साइटेशन: 2023 लाइवलॉ (एबी) 139

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