NDPS एक्टः बॉम्बे हाईकोर्ट ने माना, जांच की प्रगति का खुलासा ना हो तो जांच की अवधि बढ़ाने का आवेदन सुनवाई योग्य नहीं

Update: 2020-08-21 10:17 GMT

बॉम्बे हाईकोर्ट ने माना है कि नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सब्सटैंस एक्ट, 1985 के तहत, जांच का समय बढ़ाने के लिए दी गई अर्जी सुनवाई योग्य नहीं है, अगर एनडीपीएस अधिनियम की धारा 36 ए की उपधारा (4) की शर्त की आवश्यकताओं के अनुरूप नहीं है ।

एनडीपीएस अधिनियम की धारा 36 ए की उपधारा (4) की शर्त के तहत विस्तार की रिपोर्ट के लिए एक आवश्यकता एक यह है कि इससे जांच की प्रगति का खुलासा होना चाहिए।

धारा 36 ए (4) के अनुसार, कोर्ट लोक अभियोजक की रिपोर्ट पर, जिसमें "जांच की प्रगति का संकेत" हो और 180 दिनों की अवधि से अधिक अभियुक्त को "हिरासत में रखने के विशिष्ट कारण" हो, तो जांच का समय, 180 दिनों की मूल अवधि के अतिरिक्त, और 180 दिनों की अवधि के लिए बढ़ा सकता है।

मौजूदा मामले नयनतारा गुप्ता बनाम महाराष्ट्र राज्य में, आवेदक को 12 नवंबर, 2019 को एनडीपीएस अधिनियम के तहत गिरफ्तार किया गया था। अभियोजक की ओर से 11 मई, 2020 को जांच का समय बढ़ाने के लिए आवेदन दायर किया गया।

विशेष अदालत ने आवेदन की मेरिट पर कोई आदेश नहीं दिया और 23 मार्च को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा लिमिटेशन पीरियड बढ़ाने के सूओ मोटो आदेश के मद्देनजर, इसे लंबित रखा।

अगले दिन, आवेदक ने डिफॉल्ट जमानत की अर्जी दी। 15 मई को, विशेष अदालत ने अर्जी को खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट की ओर से लिमिटिशेन बढ़ाने के आदेश के मद्देनज़र जांच की अवधि बढ़ाई गई है।

आवेदक ने आदेश को चुनौती देते हुए उच्च न्यायालय का रुख किया।

हाईकोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने एस कासी बनाम राज्य के मामले में कहा कि है कि लिमिटेशन का सूओ मोटो विस्तार जांच पर लागू नहीं है।

जस्टिस अनुजा प्रभुदेसाई की पीठ ने कहा कि चूंकि जांच की अवधि में विस्तार, व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर अंकुश लगाता है, इसलिए यांत्रिक तरीके से ऐसे आदेश नहीं दिया जा सकते हैं, बल्‍कि इन्हें "सोच-समझकर और जांच की प्रगति और हिरासत के कारणों, जिन्हें अभियोजक की रिपोर्ट विस्तार के औचित्य के रूप में पेश किया गया है" से संतुष्ट होने के बाद दिया जा सकता है।

कोर्ट ने कहा कि आवेदन पर जांच अधिकारी द्वारा हस्ताक्षर किए गए थे और अभियोजक के हस्ताक्षर को परिशिष्ट के रूप में संलग्न कर अदालत में पेश किया गया था।

कोर्ट ने कहा, "6 मई 2020 का आवेदन कुछ भी नहीं, बल्कि समय विस्तार के लिए एक जांच अधिकारी के अनुरोध का हस्तांतरण है। ऐसा अनुरोध, जिसे जांच की प्रगति और हिरासत के कारणों से संतुष्ट हुए बिना प्रस्तुत किया गया हो, को एनडीपीएस अधिनियम की धारा 36 (ए) की उप-धारा (4) के शर्त के तहत परिकल्पित लोक अभियोजक की रिपोर्ट नहीं माना जा सकता है।"

अव‌धि विस्तार की मांग का मुख्य कारण लॉकडाउन के कारण जांच पूरा करने में असमर्थता थी। रिपोर्ट ने जांच की प्रगति का खुलासा नहीं किया गया है।

कोर्ट ने कहा, "आवेदन / रिपोर्ट में साढ़े चार महीने की अवधि के दौरान की गई जांच की प्रगति का खुलासा नहीं है, गिरफ्तारी की तारीख से लेकर लॉक डाउन की तारीख तक। रिपोर्ट में गवाहों के बयान दर्ज करने के लिए उठाए गए कदमों का जिक्र नहीं किया गया है, और साढ़े चार महीने की अवधि के दौरान सीडीआर और रासायनिक विश्लेषण रिपोर्ट मंगाने का जिक्र नहीं। परिस्थितियों के तहत, आवेदन में बताए गए कारणों को वास्तविक नहीं माना जा सकता है। जांच को पूरा करने के लिए समय बढ़ाने का कोई उचित कारण नहीं दिया गया हैं। कहना पर्याप्त है कि समय के विस्तार के लिए प्रार्थना, जो सीधे आवेदक की स्वतंत्रता को प्रभावित करती है, एक आवेदन / रिपोर्ट के आधार पर नहीं दी जा सकती जो एनडीपीएस अधिनियम की धारा 36 ए की उपधारा (4) की शर्त की आवश्यकताओं के अनुरूप नहीं है।"

अदालत ने आगे कहा कि "जमानत देने से, आवेदक-अभियुक्तों की स्वतंत्रता संरक्षित होती है, हालांकि जांच अधिकारी और सरकारी वकील के अपने वैधानिक कर्तव्यों का निर्वहन करने में बरते गए लापरवाही भरे रवैये के कारण सामाजिक हित की क्षति होती है।"

कोर्ट ने अपने फैसले में कहा, "लोक अभियोजक की लापरवाही भरी जांच या यांत्रिक रवैये के कारणों का अनुमान लगाना अदालत का काम नहीं है.....इसलिए आवश्यक है कि संबंधित प्राधिकारी उपरोक्त उल्लिखित गंभीर खामियों को देखें, जवाबदेही तय करें और मामले में सुधारात्मक उपाय करें।"

केस का विवरण

टाइटल: नयनतारा गुप्ता बनाम महाराष्ट्र राज्य

बेंच: जस्टिस अनुजा प्रभुदेसाई

प्रतिनिधित्व: आवेदक के लिए एडवोकेट गुरावव थोटे; आरएम पेठे, राज्य के लिए एपीपी; प्रतिवादी 1-UoI के लिए जितेंद्र मिश्रा।

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