प्रवासी मजदूरों/कामगारों और उनके परिवार के उपचार, उनके पुनर्वास और उनके माईग्रेशन को रोकने के लिए नीति क्या है, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी सरकार से पूछा

Update: 2020-05-28 02:56 GMT

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मंगलवार (26-मई-2020) को राज्य सरकार से यह बताने को कहा कि प्रवासी कामगारों (Migrant workmen) और उनके परिवारों को चिकित्सा सुविधा और उपचार प्रदान करने के लिए और उत्तर प्रदेश राज्य के ग्रामीण भागों में कोरोनावायरस बीमारी (COVID-19) के प्रसार को रोकने के लिए सरकार की क्या नीति और नियम (Policy and Norms) बनाए गए हैं।

अदालत ने राज्य सरकार से यह भी पूछा कि उत्तर प्रदेश राज्य में प्रवासी श्रमिकों और उनके परिवारों के पुनर्वास के लिए सरकार की क्या योजना है?

मुख्य न्यायाधीश, न्यायमूर्ति गोविन्द माथुर एवं न्यायमूर्ति रमेश सिन्हा की पीठ ने यह आदेश, उस जनहित याचिका पर दिया, जिसमे अदालत के समक्ष याचिकाकर्ताओं द्वारा, तथाकथित "प्रवासी मजदूरों" द्वारा देश भर में झेली जारी तमाम प्रकार की समस्याओं को सामने रखा गया था।

राज्य के नीति निर्देशक तत्वों की महत्वता की ओर इंगित करते हुए, याचिकाकर्ताओं ने विशेष रूप से याचिका में यह कहा कि,

"राज्य के नीति के निर्देशक सिद्धांत, लोगों के कल्याण को बढ़ावा देने के लिए एक सामाजिक व्यवस्था को सुरक्षित करने के लिए एक पूर्ण नीति/कार्यक्रम का संकेत देते हैं और आगे यह सुनिश्चित करते हैं कि पुरुष और स्त्री कर्मकारों के स्वास्नय (health) और शक्ति (strength) का तथा बालकों की सुकुमार अवस्था (tender age) का दुरुपयोग न हो। वर्तमान परिस्थितियों में, लाखों कामगारों को उनके किसी दोष के बिना मृत्यु के करीब रखा जा रहा है।"

याचिकाकर्ता द्वारा प्रवासी मजदूरों की समस्याओं के संबंध में क्या कहा गया?

गौरतलब है कि, याचिकाकर्ता और पेशे से अधिवक्ता, श्री गौरव त्रिपाठी और श्री रितेश श्रीवास्तव द्वारा अदालत के समक्ष "प्रवासी मजदूरों" की समस्याओं को लेकर यह याचिका दाखिल की गयी थी।

याचिकाकर्ताओं द्वारा यह कहा गया कि, 25 मार्च, 2020 के बाद से लॉकडाउन के चलते, देश भर में "प्रवासी मजदूर", अपने कार्यस्थल से अपने गृह नगर/गाँव तक पैदल यात्रा कर रहे हैं, जोकि सैकड़ों किलोमीटर दूर है। याचिका में, भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का हवाला देते हुए ऐसे तथाकथित प्रवासी मजदूरों की गरिमा और मानवीय स्थिति के संरक्षण की मांग की गई।

याचिकाकर्ताओं का कहना था कि न तो केंद्र सरकार द्वारा और न ही उन प्रदेशों की राज्य सरकारों द्वारा, जहां यह मजदूर काम कर रहे थे, ऐसे मजदूरों एवं उनके परिवार के लिए कोई पर्याप्त व्यवस्था की गई। याचिका के अनुसार, पर्याप्त व्यवस्थाओं के अभाव में, मजदूर और उनके परिवार को सड़कों पर दयनीय स्थिति का सामना करना पड़ रहा है।

याचिकाकर्ताओं के अनुसार,

"वास्तव में, 'प्रवासी मजदूर' (Migrant Labourer) या 'प्रवासी कामगार' (Migrant Workmen) जैसा कोई शब्द नहीं है। क़ानून केवल 'मजदूर' या 'कामगार' को निर्धारित करता है इसलिए, यह उन राज्य सरकारों की ज़िम्मेदारी थी, जहाँ यह 'मजदूर' या 'कामगार' काम काम कर रहे थे, कि उन्हें लॉकडाउन के दौरान सभी आवश्यक सुविधाएं और आवश्यकताएं प्रदान की जा सकें। इस तरह की सरकारों का दृष्टिकोण अत्यधिक निराशाजनक है क्योंकि वे मानवों के अस्तित्व को बनाए रखने में विफल रहे, जिनकी सेवाओं का उपयोग उनकी समृद्धि के लिए किया गया था।"

यह भी बताया गया है कि रेलवे स्टेशनों पर भी ऐसे मजदूरों के लिए कोई भोजन उपलब्ध नहीं है, इसलिए, "श्रमिक स्पेशल" के रूप में जानी जाने वाली ट्रेनों में यात्रा करने वाले लोगों को भुखमरी का सामना करना पड़ रहा है।

भोजन और पानी की अनुपलब्धता के कारण कानपुर और उन्नाव में हुई हिंसा का उल्लेख भी याचिकाकर्ताओं द्वारा किया गया। अदालत के समक्ष ऐसे भी कई उदाहरण लाये गए, जहां राजमार्गों या अन्य सड़कों से गुजरने वाले मजदूरों को न तो भोजन मिल रहा है और न ही गरिमा के साथ जीवित रहने का कोई साधन।

इसके अलावा, याचिकाकर्ताओं द्वारा यह भी विशेष रूप से अदालत को बताया गया कि इन मजदूरों की अनियंत्रित आवाजाही ने, सभी प्रमुख कस्बों और ग्रामीण क्षेत्रों में कोरोनावायरस बीमारी (COVID-19) के प्रसार की संभावना को भी तेज कर दिया है।

याचिका में की गयी मांग

वर्तमान परिस्थितियों के मद्देनजर, याचिकाकर्ताओं द्वारा, सड़कों पर चल रह मजदूरों/कामगारों को पर्याप्त सुविधाएं प्रदान किये जाने की मांग के अलावा, उत्तर प्रदेश राज्य के निवासियों के लिए एक मजबूत पुनर्वास कार्यक्रम (Rehabilitation programme) होने पर भी जोर दिया गया, ताकि उन्हें अपने अस्तित्व के बचाव के लिए दूसरे राज्यों में न जाना पड़े।

याचिकाकर्ताओं ने कहा कि

"उत्तर प्रदेश राज्य में रोजगार के लिए बुनियादी ढांचा उपलब्ध नहीं होने के कारण लाखों लोग अपनी आजीविका कमाने के लिए दूसरे राज्यों में पलायन करते हैं। ऐसा प्रवास/माइग्रेशन बिल्कुल भी गलत नहीं है क्योंकि पूरा भारत एक संघ है, लेकिन उन राज्य सरकारों का वर्तमान रवैया, जहां ये लोग काम कर रहे थे, संघ और संघीय ढांचे की भावना के विपरीत है, इसलिए, यह उत्तर प्रदेश राज्य के लिए अधिक आवश्यक है कि स्थानीय रोजगार के लिए यह अपने किले को मजबूत करे।"

पीठ का आदेश

हालाँकि, पीठ द्वारा यह देखा गया कि जहाँ तक समस्या तथाकथित "प्रवासी मजदूरों" के लिए परिवहन और भोजन उपलब्ध कराने के संबंध में है, तो माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने पहले ही एक जनहित याचिका (Re-Inadequacy and certain Lapses on the part of the Central and State Governments in dealing with the Migrant Workers) (  ) में 26-मई-2020 को इसका संज्ञान लिया है। इसलिए, हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से इस संबंध में कोई स्पष्टीकरण मांगना उचित नहीं समझा।

हालाँकि, प्रवासी कामगारों/मजदूरों और उनके परिवार के उपचार, उनके पुनर्वास और उनके माईग्रेशन को कम करने के लिए नीति के बारे में राज्य सरकार से पूछताछ करते हुए अदालत द्वारा यह कहा गया कि,

"हालांकि, हम यह उचित समझते हैं कि राज्य यह बताये कि प्रवासी कामगारों (Migrant workmen) और उनके परिवारों को चिकित्सा सुविधा और उपचार प्रदान करने के लिए और उत्तर प्रदेश राज्य के ग्रामीण भागों में कोरोनावायरस बीमारी (COVID-19) के प्रसार को रोकने के लिए सरकार की क्या नीति और नियम (policy and norms) हैं।"

अदालत ने आगे अपने आदेश में यह कहा कि,

"इसके अलावा, यह भी बताया जाए कि उत्तर प्रदेश राज्य में ही प्रवासी कामगारों और उनके परिवारों के पुनर्वास के लिए सरकार की योजना क्या है। राज्य को न्यूनतम आजीविका कमाने के लिए देश के अन्य हिस्सों में उत्तर प्रदेश के प्रवासियों के माइग्रेशन को कम करने के लिए लेखा-जोखा देने की भी आवश्यकता है।"

अतिरिक्त महाधिवक्ता श्री मनीष गोयल के माध्यम से उत्तर प्रदेश राज्य को अदालत द्वारा एक नोटिस जारी किया गया। जारी किए गए नोटिस का जवाब सरकार को 1 जून, 2020 तक देना होगा।

मामले का विवरण:

केस टाइटल: रितेश श्रीवास्तव एवं अन्य बनाम उत्तर-प्रदेश राज्य

केस नं : PIL No. 583/2020

कोरम : मुख्य न्यायाधीश, न्यायमूर्ति गोविन्द माथुर एवं रमेश सिन्हा

आदेश की प्रति डाउनलोड करने के लिए यहां क्लिक करें




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