गलत गिरफ्तारी और 54 दिन की न्यायिक हिरासत के लिए NRI को 14 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश
केरल हाइकोर्ट ने एक अहम फैसले में राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह एक NRI व्यक्ति और उसके परिवार को गलत गिरफ्तारी और अवैध हिरासत के लिए कुल 14 लाख रुपये मुआवजा अदा करे। कोर्ट ने माना कि पुलिस की कार्रवाई के कारण याचिकाकर्ताओं को मानसिक पीड़ा, सामाजिक अपमान, उत्पीड़न और गंभीर नुकसान उठाना पड़ा।
जस्टिस पी.एम. मनोज ने NRI व्यक्ति वी.के. ताजुद्दीन को 10 लाख रुपये तथा उनकी पत्नी, पुत्र, पुत्री और नाबालिग पुत्र को एक-एक लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता वी.के. ताजुद्दीन कतर में एक रेंट-ए-कार कंपनी में कार्यरत थे। वर्ष 2018 में वे अपनी बेटी की शादी के लिए 15 दिन की छुट्टी लेकर केरल आए। इसी दौरान उन्हें एक चेन स्नैचिंग के मामले में झूठे आरोपों में फंसा दिया गया और गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बाद उन्हें 54 दिनों तक न्यायिक हिरासत में रखा गया, जब तक कि हाइकोर्ट से उन्हें जमानत नहीं मिली।
हिरासत के कारण ताजुद्दीन समय पर कतर वापस नहीं जा सके, जिससे उनकी नौकरी चली गई। बाद में कतर लौटने पर उन्हें वहां भी 23 दिनों तक जेल में रहना पड़ा। उन्होंने मानवाधिकार आयोग, राज्य बाल अधिकार आयोग, अल्पसंख्यक आयोग और वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों से भी शिकायत की, लेकिन कोई राहत नहीं मिली।
अंततः ताजुद्दीन और उनके परिवार ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाइकोर्ट का रुख करते हुए जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार (अनुच्छेद 21) के उल्लंघन का आरोप लगाया और एक करोड़ रुपये मुआवजे की मांग की।
पुलिस कार्रवाई पर गंभीर आरोप
याचिका के अनुसार, एक रात जब परिवार रिश्तेदार के घर से लौट रहा था, तभी पुलिस टीम ने उनकी गाड़ी रोक ली। पुलिस ने ताजुद्दीन को जबरन गाड़ी से बाहर खींचा, जबकि परिवार ने बताया कि उन्हें कमर में गंभीर दर्द है। पुलिस ने उनकी जबरन तस्वीरें लीं, उन्हें चोर कहकर अपमानित किया और पूरे परिवार को तड़के थाने ले जाया गया।
पुलिस ने आरोप लगाया कि ताजुद्दीन ने सफेद स्कूटर से एक महिला की साढ़े पांच सोने की चेन छीनी है और एक सीसीटीवी फुटेज दिखाया, जिसमें दाढ़ी वाला व्यक्ति दिखाई दे रहा था। पुलिस ने दावा किया कि वही ताजुद्दीन हैं। इसके बाद उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और उनका पासपोर्ट, बेटे की महंगी घड़ी तथा 56 हजार रुपये जब्त कर लिए गए।
याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि उन्हें शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया। ताजुद्दीन को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 392 के तहत आरोपी बनाया गया और साक्ष्य जुटाने के नाम पर सार्वजनिक रूप से घुमाया गया। हालांकि, न तो चेन और न ही स्कूटर उनके पास से बरामद हुआ।
जांच में खुलासा
परिवार ने पुलिस को बताया कि घटना के समय ताजुद्दीन घटनास्थल से काफी दूर थे, लेकिन पुलिस ने उनकी बात नहीं सुनी। सीसीटीवी फुटेज की विशेषज्ञ जांच और मोबाइल टावर लोकेशन की मांग भी ठुकरा दी गई। इसके बाद ताजुद्दीन ने मुख्यमंत्री से हस्तक्षेप की गुहार लगाई।
मामले की जांच उप पुलिस अधीक्षक (DSP) को सौंपी गई। DSP की विस्तृत जांच में ताजुद्दीन को निर्दोष पाया गया और किसी अन्य व्यक्ति को असली आरोपी ठहराया गया। जांच रिपोर्ट में पुलिस अधिकारियों की गंभीर लापरवाहियों का उल्लेख किया गया।
हाइकोर्ट का फैसला
सभी पक्षकारों की दलीलें सुनने के बाद हाइकोर्ट ने कहा कि यह मामला अवैध गिरफ्तारी और हिरासत का है, जिसमें अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ है। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में मुआवजा देना दो उद्देश्यों को पूरा करता है पीड़ित को राहत देना और राज्य व उसके अधिकारियों की जवाबदेही सुनिश्चित करना।
हाइकोर्ट ने कहा,
“मुआवजा देने का उद्देश्य केवल पीड़ित को राहत देना ही नहीं, बल्कि कानून के शासन की पुनः पुष्टि करना और भविष्य में ऐसे उल्लंघनों को रोकना भी है।”
कोर्ट ने आत्मसंयम बरतते हुए ताजुद्दीन को 10 लाख रुपये और उनके परिवार के अन्य सदस्यों को एक-एक लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया।
साथ ही, हाइकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता पुलिस अधिकारियों के खिलाफ अन्य दीवानी उपाय अपनाने के लिए स्वतंत्र होंगे। राज्य सरकार चाहें तो उचित प्रक्रिया अपनाकर दोषी पुलिस अधिकारियों से मुआवजे की राशि वसूल सकती है।
इसी के साथ याचिका का निपटारा कर दिया गया।