न्यायाधीशों को पदोन्नति से इनकार, जिला न्यायपालिका में नियुक्ति की मांग करने वाले जजों ने हरियाणा सरकार के निर्णय पर सवाल उठाया

Update: 2023-09-20 15:00 GMT

Punjab & Haryana High Court

हरियाणा में जिला न्यायपालिका में नियुक्ति की मांग करने सिविल न्यायाधीशों और न्यायिक दंडाधिकारियों ने राज्य सरकार के उस फैसले को चुनौती दी है,जिसमें 13 न्यायिक अधिकारियों की पदोन्नति के लिए हाईकोर्ट की तरफ से की गई सिफारिशों को खारिज कर दिया गया है।

उन्होंने दलील दी है कि राज्य सरकार ने जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति के मामले में केंद्रीय कानून मंत्रालय को शामिल करके ‘‘संवैधानिक प्रोटोकॉल’’ का उल्लंघन किया है।

संविधान के अनुच्छेद 233 में प्रावधान है कि किसी भी राज्य में जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति राज्य के राज्यपाल द्वारा क्षेत्राधिकार वाले हाईकोर्ट के साथ परामर्श करने के बाद की जाएगी। हालांकि, हरियाणा सरकार ने केंद्रीय मंत्रालय से ली ‘‘कानूनी राय’’ का हवाला देते हुए हाईकोर्ट की सिफारिश को खारिज कर दिया है। चयन प्रक्रिया को पूरा करने की मांग को लेकर न्यायाधीशों द्वारा हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाने के बाद यह निर्णय लिया गया है।

संशोधित याचिका में पीड़ित जजों ने कहा,

‘‘राज्य सरकार ने संवैधानिक प्रोटोकॉल का पूर्ण उल्लंघन करते हुए, इस माननीय न्यायालय से परामर्श लेने के बजाय, अनुच्छेद 233 और हरियाणा सुपीरियर न्यायिक सेवा नियम, 2007 की रूपरेखा से परे कदम उठाते हुए...न्याय विभाग, विधि एवं न्याय मंत्रालय, भारत सरकार, नई दिल्ली से कानूनी राय मांगी है। यह दोहराया गया कि ऐसा कृत्य अनुच्छेद 233 के तहत निर्धारित संवैधानिक जनादेश का उल्लंघन है, जो केवल इस माननीय हाईकोर्ट के साथ परामर्श का प्रावधान करता है, किसी अन्य पक्षकार या इकाई के साथ नहीं।’’

संशोधित याचिका में कहा गया है कि केंद्र से कानूनी राय मांगने के बाद भी हाईकोर्ट से कोई सूचना या परामर्श नहीं मांगा गया।

हरियाणा सरकार ने कहा है कि एक वकील से पत्र मिलने के बाद कानूनी राय मांगी गई थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को शामिल किए बिना नियुक्तियों के लिए पात्रता मानदंड को संशोधित किया है। केंद्रीय कानून मंत्रालय ने कहा है कि हरियाणा सुपीरियर न्यायिक सेवा नियमों में संशोधन के लिए राज्य सरकार से परामर्श करना ‘‘अनिवार्य’’ है।

याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि जब वैधानिक नियमों में कोई रोक नहीं है, तो सर्वाेत्तम उपलब्ध प्रतिभा प्राप्त करने के लिए लिखित और मौखिक परीक्षाओं के लिए न्यूनतम उत्तीर्ण अंक/कट-ऑफ निर्धारित करना हाईकोर्ट के अधिकार क्षेत्र में आएगा।

‘‘जहां कोई नियम कोई न्यूनतम मानक निर्धारित नहीं करता है, हाईकोर्ट प्रासंगिक मानकों को लागू करने की दृष्टि से नियमों को पूरक कर सकता है और इसे क़ानून का उल्लंघन नहीं माना जाएगा...’’

उन्होंने प्रार्थना की है कि राज्य के फैसले को रद्द कर दिया जाए और राज्य को हाईकोर्ट की सिफारिशों को लागू करने का निर्देश दिया जाए।

इस मामले की सुनवाई 09 अक्टूबर को होगी।

केस टाइटल- शिखा व अन्य बनाम हरियाणा राज्य व अन्य

याचिकाकर्ताओं की तरफ से वरिष्ठ वकील गुरमिंदर सिंह व वकील हरप्रिया खनेका पेश हुए

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