कैसे पुलिस केवल आईपीसी की धारा 34 और 120-बी के तहत चार्जशीट दाखिल कर सकती हैः इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आईओ से मांगा स्पष्टीकरण

Update: 2020-11-05 04:15 GMT

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सोमवार (02 नवंबर) को पुलिस स्टेशन अखंड नगर, जिला सुल्तानपुर से जुड़े जांच अधिकारी और सर्कल ऑफिसर को यह पूछने के लिए बुलाया कि कैसे सिर्फ आईपीसी की धारा 34 और 120-बी के तहत चार्जशीट दायर की गई है?

न्यायमूर्ति दिनेश कुमार सिंह की खंडपीठ ने दोनों अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वह मामले की अगली सुनवाई पर अदालत के समक्ष उपस्थित रहे और व्यक्तिगत हलफनामों पर लिखित रूप से अपना स्पष्टीकरण प्रस्तुत करें।

गौरतलब है कि कोर्ट इस मामले में आरोपित-आवेदक के खिलाफ आईपीसी की धारा 34 और 120-बी के तहत दायर एक आरोप पत्र पर विचार कर रही है। वर्ष 2019 में पुलिस स्टेशन अखंड नगर,जिला सुल्तानपुर में एक एआईआर नंबर 0382 दर्ज की गई थी, जो कि धारा 307 के तहत दर्ज की गई थी। परंतु पीड़ित की मौत हो जाने के बाद धारा 302 जोड़ दी गई थी।

न्यायालय ने कहा कि,

''न तो आईपीसी की धारा 34 के तहत और न ही आईपीसी की धारा 120-बी के तहत किया गया अपराध एक स्वतंत्र अपराध हैं। ये ऐसे अपराध हैं जिन्हें मूल अपराधों के साथ पढ़ा जाता है।''

कोर्ट ने आगे कहा,

''यह बहुत ही अजीब है कि चार्जशीट केवल आईपीसी की धारा 34 और 120-बी के तहत दायर की गई है। आईपीसी की धारा 34 और 120-बी के तहत चार्जशीट को मूल अपराधों को शामिल किए बिना कैसे दायर किया जा सकता है?''

उपरोक्त के मद्देनजर, अदालत ने कहा कि यह आवश्यक है कि जांच अधिकारी, जिसने अपराध की जांच की है, और सर्कल अधिकारी, जिसने इस जांच की निगरानी की होगा,मामले की अगली तारीख पर इस न्यायालय के समक्ष उपस्थित रहें।

उन्हें व्यक्तिगत हलफनामों पर लिखित रूप में अपना स्पष्टीकरण प्रस्तुत करने का आदेश दिया गया है कि कैसे आईपीसी की धारा 34 और 120-बी के तहत दायर आरोप-पत्र मामले की सुनवाई के दौरान न्यायालय के समक्ष टिक पाएगा,जबकि उसमें मूल अपराधों को शामिल ही नहीं किया गया है।

इस मामले की अगली सुनवाई अब 17 नवंबर, 2020 को होगी।

संपादक की टिप्पणियाँ

यह ध्यान दिया जा सकता है कि गुरुदत्त मल बनाम यूपी राज्य एआईआर 1965 एससी 257 मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिया गया फैसला यह स्पष्ट करता है कि भारतीय दंड संहिता की धारा 34 एक अलग अपराध नहीं बनाती है; यह केवल संयुक्त आपराधिक दायित्व के सिद्धांत का पालन करती है।

गुरुदत्त मल (सुप्रा) में शीर्ष अदालत ने फैसला सुनाया था कि,

''संहिता की धारा 34 के आवेदन के लिए आवश्यक शर्त है,सामान्य इरादे से सभी अभियुक्तों द्वारा किसी अपराध को करना या किसी कार्य को करने में सभी अभियुक्तों की भागीदारी या एक समान इरादे से काम को करना। यदि यह दो सामग्री या शर्त स्थापित हो जाती है तो सभी अभियुक्त उक्त अपराध के लिए उत्तरदायी होंगे।''

दूसरे शब्दों में, आईपीसी की धारा 34 के अनुसार कई व्यक्तियों द्वारा एक समान इरादे से कोई कार्य करना। इस प्रावधान के तहत रचनात्मक जिम्मेदारी उत्पन्न हो जाएगी, यदि निम्नलिखित दो शर्तें पूरी होती हैं तो -

(1) आपराधिक कृत्य को करने के लिए सामान्य इरादा होना चाहिए; तथा

(2) उस इरादे को आगे बढ़ाते हुए इस तरह के कृत्य को करने में सभी व्यक्तियों की भागीदारी होनी चाहिए।

यदि इन दो सामग्रियों को स्थापित कर दिया जाता है, तो सभी अभियुक्त उस अपराध के लिए उत्तरदायी होंगे जो अपराध किया गया है।

120बी मूल अपराध नहीं?

जहां तक आईपीसी की धारा 120 बी के तहत आरोप लगाने का संबंध है, यह ध्यान दिया जा सकता है कि भारतीय दंड संहिता में, जैसा कि मूल रूप से अधिनियमित किया गया था, आपराधिक षड्यंत्र अपने आप में एक अपराध नहीं था।

वर्ष 1913 में भारतीय दंड संहिता में चैप्टर V-A को जोड़कर आपराधिक षड्यंत्र को मूल अपराध बनाया गया था। इसके पीछे विचार यह था कि अपराधों के कमीशन को रोका जाए।

जबकि धारा 120-ए ''आपराधिक षड्यंत्र'' को परिभाषित करती है और धारा 120 बी में आपराधिक साजिश के अपराध के लिए सजा का प्रावधान है।

आपराधिक षड्यंत्र, जैसा कि आईपीसी की धारा 120-ए के तहत परिभाषित किया गया है, दो या दो से अधिक व्यक्तियों के बीच किसी काम को करने का एक समझौता होता है, या गैरकानूनी कार्य किया जाता है, गैरकानूनी तरीकों से (नूर मोहम्मद मोहम्मद यूसुफ मोमिन बनाम महाराष्ट्र राज्य 1971 एआईआर 885 में देंखे)।

विशेष रूप से, धारा 120 बी के तहत अपराध इस अर्थ में अन्य अपराधों से अलग है कि इस धारा के तहत केवल एक समझौता करना ही अपराध बन जाता है, भले ही उस समझौते को पूरा करने के लिए कोई कदम नहीं उठाया जाए।

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